भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 2297, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 2297

‘नरेश्वर! भगवान् करें कि बुद्धिमान् कुन्तीकुमार राजा युधिष्ठिर धैर्यपूर्वक सहस्रों वर्षतक हमारा पालन करें और हम इनके राज्यमें सुखसे रहें॥ २२ १/२॥ राजर्षीणां पुराणानां भवतां पुण्यकर्मणाम्॥ २३॥ कुरुसंवरणादीनां भरतस्य च धीमतः। वृत्तं समनुयात्येष धर्मात्मा भूरिदक्षिणः॥ २४॥ ‘यज्ञोंमें बड़ी-बड़ी दक्षिणा प्रदान करनेवाले ये धर्मात्मा राजा युधिष्ठिर प्राचीन कालके पुण्यात्मा राजर्षि कुरु और संवरण आदिके तथा बुद्धिमान् राजा भरतके बर्तावका अनुसरण करते हैं॥ २३-२४॥ नात्र वाच्यं महाराज सुसूक्ष्ममपि विद्यते। उषिताः स्म सुखं नित्यं भवता परिपालिताः॥ २५॥ ‘महाराज! इनमें कोई छोटे-से-छोटा दोष भी नहीं है। इनके राज्यमें आपके द्वारा सुरक्षित होकर हमलोग सदा सुखसे रहते आये हैं॥ २५॥ सुसूक्ष्मं च व्यलीकं ते सपुत्रस्य न विद्यते। यत् तु ज्ञातिविमर्देऽस्मिन्नात्थ दुर्योधनं प्रति॥ २६॥ भवन्तमनुनेष्यामि तत्रापि कुरुनन्दन। ‘कुरुनन्दन! पुत्रसहित आपका कोई सूक्ष्म-से-सूक्ष्म अपराध भी हमारे देखनेमें नहीं आया है। महाभारत-युद्धमें जो जाति-भाइयोंका संहार हुआ है, उसके विषयमें आपने जो दुर्योधनके अपराधकी चर्चा की है, इसके सम्बन्धमें भी मैं आपसे कुछ निवेदन करूँगा॥ २६ १/२॥ न तद् दुर्योधनकृतं न च तद् भवता कृतम्॥ २७॥ न कर्णसौबलाभ्यां च कुरवो यत् क्षयं गताः। ‘कौरवोंका जो संहार हुआ है, उसमें न दुर्योधनका हाथ है, न आपका। कर्ण और शकुनिने भी इसमें कुछ नहीं किया है॥ २७ १/२॥ दैवं तत् तु विजानीमो यन्न शक्यं प्रबाधितुम्॥ २८॥ दैवं पुरुषकारेण न शक्यमपि बाधितुम्। ‘हमारी समझमें तो यह दैवका विधान था। इसे कोई टाल नहीं सकता था। दैवको पुरुषार्थसे मिटा देना असम्भव है॥ २८ १/२॥ अक्षौहिण्यो महाराज दशाष्टौ च समागताः॥ २९॥ अष्टादशाह्नेन हताः कुरुभिर्योधपुङ्गवैः। भीष्मद्रोणकृपाद्यैश्च कर्णेन च महात्मना॥ ३०॥ युयुधानेन वीरेण धृष्टद्युम्नेन चैव ह। चतुर्भिः पाण्डुपुत्रैश्च भीमार्जुनयमैस्तथा॥ ३१॥