भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 2296, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 2296

न जात्वस्य च वंशस्य राज्ञां कश्चित् कदाचन । राजाऽऽसीद् यः प्रजापालः प्रजानामप्रियोऽभवत् ॥ १५ ॥ ‘इस राजवंशमें कभी कोई भी ऐसा राजा नहीं हुआ, जो प्रजापालन करते समय समस्त प्रजाओंको प्रिय न रहा हो ॥ १५ ॥ पितृवद् भ्रातृवच्चैव भवन्तः पालयन्ति नः । न च दुर्योधनः किंचिदयुक्तं कृतवान् नृपः ॥ १६ ॥ ‘आपलोग पिता और बड़े भाईके समान हमारा पालन करते आये हैं। राजा दुर्योधनने भी हमारे साथ कोई अनुचित बर्ताव नहीं किया है ॥ १६ ॥ यथा ब्रवीति धर्मात्मा मुनिः सत्यवतीसुतः । तथा कुरु महाराज स हि नः परमो गुरुः ॥ १७ ॥ ‘महाराज! परम धर्मात्मा सत्यवतीनन्दन महर्षि व्यासजी आपको जैसी सलाह देते हैं, वैसा ही कीजिये; क्योंकि वे हम सब लोगोंके परम गुरु हैं ॥ १७ ॥ त्यक्ता वयं तु भवता दुःखशोकपरायणाः । भविष्यामश्चिरं राजन् भवद्गुणशतैर्युताः ॥ १८ ॥ ‘राजन्! आप जब हमें त्याग देंगे, हमें छोड़कर चले जायँगे, तब हम बहुत दिनोंतक दुःख और शोकमें डूबे रहेंगे। आपके सैकड़ों गुणोंकी याद सदा हमें घेरे रहेगी ॥ यथा शान्तनुना गुप्ता राज्ञा चित्राङ्गदेन च । भीष्मवीर्योपगूढेन पित्रा तव च पार्थिव ॥ १९ ॥ भवदुदीक्षणाच्चैव पाण्डुना पृथिवीक्षिता । तथा दुर्योधनेनापि राज्ञा सुपरिपालिताः ॥ २० ॥ ‘पृथ्वीनाथ! महाराज शान्तनु तथा राजा चित्रांगदने जिस प्रकार हमारी रक्षा की है, भीष्मके पराक्रमसे सुरक्षित आपके पिता विचित्रवीर्यने जिस तरह हमलोगोंका पालन किया है तथा आपकी देख-रेखमें रहकर पृथ्वीपति पाण्डुने जिस प्रकार प्रजाजनोंकी रक्षा की है, उसी प्रकार राजा दुर्योधनने भी हमलोगोंका यथावत् पालन किया है ॥ १९-२० ॥ न स्वल्पमपि पुत्रस्ते व्यलीकं कृतवान् नृप । पितरीव सुविश्वस्तास्तस्मिन्नपि नराधिपे ॥ २१ ॥ वयमास्म यथा सम्यग् भवतो विदितं तथा । ‘नरेश्वर! आपके पुत्रने कभी थोड़ा-सा भी अन्याय हमलोगोंके साथ नहीं किया। हमलोग उन राजा दुर्योधनपर भी पिताके समान विश्वास करते थे और उनके राज्यमें बड़े सुखसे जीवन व्यतीत करते थे। यह बात आपको भी विदित ही है’ ॥ २१ १/२ ॥ तथा वर्षसहस्राणि कुन्तीपुत्रेण धीमता ॥ २२ ॥ पाल्यमाना धृतिम‍ता सुखं विन्दामहे नृप ।