महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलगे। अपनी संतानको विदा करते समय दुःखसे कातर हुए पिता-माताकी भाँति वे दो घड़ीतक शोकसे संतप्त होकर रोते रहे॥ ६-७॥ हृदयैः शून्यभूतैस्ते धृतराष्ट्रप्रवासजम्। दुःखं संधारयन्तो हि नष्टसंज्ञा इवाभवन्॥ ८॥ उनका हृदय शून्य-सा हो गया था। वे उस सूने हृदयसे धृतराष्ट्रके प्रवासजनित दुःखको धारण करके अचेत-से हो गये॥ ८॥ ते विनीय तमायासं धृतराष्ट्रवियोगजम्। शनैः शनैस्तदान्योन्यमब्रुवन् सम्मतान्युत॥ ९॥ फिर धीरे-धीरे उनके वियोगजनित दुःखको दूर करके उन सबने आपसमें वार्तालाप किया और अपनी सम्मति प्रकट की॥ ९॥ ततः संधाय ते सर्वे वाक्यान्यथ समासतः। एकस्मिन् ब्राह्मणे राजन् निवेश्योचुर्नराधिपम्॥ १०॥ राजन्! तदनन्तर एकमत होकर उन सब लोगोंने थोड़ेमें अपनी सारी बातें कहनेका भार एक ब्राह्मणपर रखा। उन ब्राह्मणके द्वारा ही उन्होंने राजासे अपनी बात कही॥ १०॥ ततः स्वाचरणो विप्रः सम्मतोऽर्थविशारदः। साम्बाख्यो बह्वृचो राजन् वक्तुं समुपचक्रमे॥ ११॥ अनुमान्य महाराजं तत् सदः सम्प्रसाद्य च। विप्रः प्रगल्भो मेधावी स राजानमुवाच ह॥ १२॥ वे ब्राह्मण देवता सदाचारी, सबके माननीय और अर्थज्ञानमें निपुण थे, उनका नाम था साम्ब। वे वेदके विद्वान्, निर्भय होकर बोलनेवाले और बुद्धिमान् थे। वे महाराजको सम्मान देकर सारी सभाको प्रसन्न करके बोलनेको उद्यत हुए। उन्होंने राजासे इस प्रकार कहा—॥ ११-१२॥ राजन् वाक्यं जनस्यास्य मयि सर्वं समर्पितम्। वक्ष्यामि तदहं वीर तज्जुषस्व नराधिप॥ १३॥ ‘राजन्! वीर नरेश्वर! यहाँ उपस्थित हुए समस्त जनसमुदायने अपना मन्तव्य प्रकट करनेका सारा भार मुझे सौंप दिया है; अतः मैं ही इनकी बातें आपकी सेवामें निवेदन करूँगा। आप सुननेकी कृपा करें'॥ १३॥ यथा वदसि राजेन्द्र सर्वमेतत् तथा विभो। नात्र मिथ्या वचः किंचित् सुहृत्त्वं नः परस्परम्॥ १४॥ ‘राजेन्द्र! प्रभो! आप जो कुछ कहते हैं, वह सब ठीक है। उसमें असत्यका लेश भी नहीं है। वास्तवमें इस राजवंशमें और हमलोगोंमें परस्पर दृढ़ सौहार्द स्थापित हो चुका है॥ १४॥