भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 2300, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 2300

'कुरुनन्दन! ये पाँचों भाई पाण्डव बड़े पराक्रमी, महामनस्वी और पुरवासियोंके हितसाधनमें लगे रहनेवाले हैं। ये कोमल स्वभाववाले सत्पुरुषोंके प्रति मृदुतापूर्ण बर्ताव करते हैं, किंतु तीखे स्वभाववाले दुष्टोंके लिये ये विषधर सर्पोंके समान भयंकर बन जाते हैं।। ४५ १/२ ।।

न कुन्ती न च पाञ्चाली न चोलूपी न सात्वती ॥ ४६ ॥ अस्मिन् जने करिष्यन्ति प्रतिकूलानि कर्हिचित् । 'कुन्ती, द्रौपदी, उलूपी और सुभद्रा भी कभी प्रजाजनोंके प्रति प्रतिकूल बर्ताव नहीं करेंगी।। ४६ १/२ ।।

भवत्कृतमिमं स्नेहं युधिष्ठिरविवर्धितम् ॥ ४७ ॥ न पृष्ठतः करिष्यन्ति पौरा जानपदा जनाः । 'आपका प्रजाके साथ जो स्नेह था, उसे युधिष्ठिरने और भी बढ़ा दिया है। नगर और जनपदके लोग आपलोगोंके इस प्रजा-प्रेमकी कभी अवहेलना नहीं करेंगे।।

अधर्मिष्ठानपि सतः कुन्तीपुत्रा महारथाः ॥ ४८ ॥ मानवान् पालयिष्यन्ति भूत्वा धर्मपरायणाः । 'कुन्तीके महारथी पुत्र स्वयं धर्मपरायण रहकर अधर्मी मनुष्योंका भी पालन करेंगे।। ४८ १/२ ।।

स राजन् मानसं दुःखमपनीय युधिष्ठिरात् ॥ ४९ ॥ कुरु कार्याणि धर्म्याणि नमस्ते पुरुषर्षभ । 'अतः पुरुषप्रवर महाराज! आप युधिष्ठिरकी ओरसे अपने मानसिक दुःखको हटाकर धार्मिक कार्योंके अनुष्ठानमें लग जाइये। आपको समस्त प्रजाका नमस्कार है'।। ४९ १/२ ।।

वैशम्पायन उवाच

तस्य तद् वचनं धर्म्यमनुमान्य गुणोत्तरम् ॥ ५० ॥ साधु साध्विति सर्वः स जनः प्रतिगृहीतवान् । वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! साम्बके धर्मानुकूल और उत्तम गुणयुक्त वचन सुनकर समस्त प्रजा उन्हें सादर साधुवाद देने लगी तथा सबने उनकी बातका अनुमोदन किया।। ५० १/२ ।।

धृतराष्ट्रश्च तद्वाक्यमभिपूज्य पुनः पुनः ॥ ५१ ॥ विसर्जयामास तदा प्रकृतीस्तु शनैः शनैः । स तैः सम्पूजितो राजा शिवेनावेक्षितस्तथा ॥ ५२ ॥ धृतराष्ट्रने भी बारंबार साम्बके वचनोंकी सराहना की और सब लोगोंसे सम्मानित होकर धीरे-धीरे सबको विदा कर दिया। उस समय सबने उन्हें शुभ दृष्टिसे ही देखा।। ५१-५२।।

प्राञ्जलिः पूजयामास तं जनं भरतर्षभ ।