महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2302, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंएकादशोऽध्यायः
धृतराष्ट्रका विदुरके द्वारा युधिष्ठिरसे श्राद्धके लिये धन माँगना, अर्जुनकी सहमति और भीमसेनका विरोध
वैशम्पायन उवाच
ततो रजन्यां व्युष्टायां धृतराष्ट्रोऽम्बिकासुतः ।
विदुरं प्रेषयामास युधिष्ठिरनिवेशनम् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! तदनन्तर जब रात बीती और सबेरा हुआ, तब अम्बिकानन्दन राजा धृतराष्ट्रने विदुरजीको युधिष्ठिरके महलमें भेजा ॥ १ ॥
स गत्वा राजवचनादुवाचाच्युतमीश्वरम् ।
युधिष्ठिरं महातेजाः सर्वबुद्धिमतां वरः ॥ २ ॥
राजाकी आज्ञासे अपने धर्मसे कभी विचलित न होनेवाले राजा युधिष्ठिरके पास जाकर समस्त बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ महातेजस्वी विदुरने इस प्रकार कहा— ॥ २ ॥
धृतराष्ट्रो महाराजो वनवासाय दीक्षितः ।
गमिष्यति वनं राजन्नागतां कार्तिकीमिमाम् ॥ ३ ॥
‘राजन्! महाराज धृतराष्ट्र वनवासकी दीक्षा ले चुके हैं। इसी कार्तिकी पूर्णिमाको जो कि अब निकट आ पहुँची है, वे वनकी यात्रा करेंगे ॥ ३ ॥
स त्वां कुरुकुलश्रेष्ठ किंचिदर्थमभीप्सति ।
श्राद्धमिच्छति दातुं स गाङ्गेयस्य महात्मनः ॥ ४ ॥
द्रोणस्य सोमदत्तस्य बाह्लीकस्य च धीमतः ।
पुत्राणां चैव सर्वेषां ये चान्ये सुहृदो हताः ॥ ५ ॥
‘कुरुकुलश्रेष्ठ! इस समय वे तुमसे कुछ धन लेना चाहते हैं। उनकी इच्छा है कि महात्मा भीष्म, द्रोणाचार्य, सोमदत्त, बुद्धिमान् बाह्लीक और युद्धमें मारे गये अपने समस्त पुत्रों तथा अन्य सुहृदोंका श्राद्ध करें ।।
यदि चाप्यनुजानीषे सैन्धवापसदस्य च ।
‘यदि तुम्हारी सम्मति हो तो वे उस नराधम सिन्धुराज जयद्रथका भी श्राद्ध करना चाहते हैं’ ॥ ५ १/२ ॥