महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2304, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ें‘भैया भीम! राजा धृतराष्ट्र हमारे ताऊ और वृद्ध पुरुष हैं। इस समय वे वनवासकी दीक्षा ले चुके हैं और जानेके पहले वे भीष्म आदि समस्त सुहृदोंका और्ध्वदेहिक श्राद्ध कर लेना चाहते हैं॥ ९ १/२॥ भवता निर्जितं वित्तं दातुमिच्छति कौरवः ॥ १० ॥ भीष्मादीनां महाबाहो तदनुज्ञातुमर्हसि । ‘महाबाहो! कुरुपति धृतराष्ट्र आपके द्वारा जीते गये धनको आपसे माँगकर उसे भीष्म आदिके लिये देना चाहते हैं; अतः आपको इसके लिये स्वीकृति दे देनी चाहिये॥ १० १/२॥ दिष्ट्या त्वद्य महाबाहो धृतराष्ट्रः प्रयाचते ॥ ११ ॥ याचितो यः पुरास्माभिः पश्य कालस्य पर्ययम् । ‘महाबाहो! सौभाग्यकी बात है कि आज राजा धृतराष्ट्र हमलोगोंसे धनकी याचना करते हैं। समयका उलट-फेर तो देखिये। पहले हमलोग जिनसे याचना करते थे, आज वे ही हमसे याचना करते हैं॥ ११ १/२॥ योऽसौ पृथिव्याः कृत्स्नाया भर्ता भूत्वा नराधिपः ॥ १२ ॥ परैर्विनिहतामात्यो वनं गन्तुमभीप्सति । ‘एक दिन जो सम्पूर्ण भूमण्डलका भरण-पोषण करनेवाले नरेश थे, उनके सारे मन्त्री और सहायक शत्रुओंद्वारा मार डाले गये और आज वे वनमें जाना चाहते हैं॥ १२ १/२॥ मा तेऽन्यत् पुरुषव्याघ्र दानाद् भवतु दर्शनम् ॥ १३ ॥ अयशस्यमतोऽन्यत् स्यादधर्मश्च महाभुज । ‘पुरुषसिंह! अतः आप उन्हें धन देनेके सिवा दूसरा कोई दृष्टिकोण न अपनावें। महाबाहो! उनकी याचना ठुकरा देनेसे बढ़कर हमारे लिये और कोई कलंककी बात न होगी। उन्हें धन न देनेसे हमें अधर्मका भी भागी होना पड़ेगा॥ १३ १/२॥ राजानमुपशिक्षस्व ज्येष्ठं भ्रातरमीश्वरम् ॥ १४ ॥ अर्हस्त्वमपि दातुं वै नादातुं भरतर्षभ । ‘आप अपने बड़े भाई ऐश्वर्यशाली महाराज युधिष्ठिरके बर्तावसे शिक्षा ग्रहण करें। भरतश्रेष्ठ! आप भी दूसरोंको देनेके ही योग्य हैं; दूसरोंसे लेनेके योग्य नहीं’॥ १४ १/२॥ एवं ब्रुवाणं बीभत्सुं धर्मराजोऽप्यपूजयत् ॥ १५ ॥ भीमसेनस्तु संक्रोधः प्रोवाचेदं वचस्तदा । ऐसी बात कहते हुए अर्जुनकी धर्मराज युधिष्ठिरने भूरि-भूरि प्रशंसा की। तब भीमसेनने कुपित होकर उनसे यह बात कही—॥ १५ १/२॥ वयं भीष्मस्य दास्यामः प्रेतकार्यं तु फाल्गुन ॥ १६ ॥ सोमदत्तस्य नृपतेर्भूरिश्रवस एव च । बाह्लीकस्य च राजर्षेर्द्रोणस्य च महात्मनः ॥ १७ ॥