महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअन्येषां चैव सर्वेषां कुन्ती कर्णाय दास्यति ।
‘अर्जुन! हमलोग स्वयं ही भीष्म, राजा सोमदत्त, भूरिश्रवा, राजर्षि बाह्लीक, महात्मा द्रोणाचार्य तथा अन्य सब सम्बन्धियोंका श्राद्ध करेंगे। हमारी माता कुन्ती कर्णके लिये पिण्डदान करेगी ।। १६-१७ १/२ ।।
श्राद्धानि पुरुषव्याघ्र मा प्रादात् कौरवो नृपः ।। १८ ।।
इति मे वर्तते बुद्धिर्मा नो निन्दन्तु शत्रवः ।
‘पुरुषसिंह! मेरा यही विचार है कि कुरुवंशी राजा धृतराष्ट्र उक्त महानुभावोंका श्राद्ध न करें। इसके लिये हमारे शत्रु हमारी निन्दा न करें ।। १८ १/२ ।।
कष्टात् कष्टतरं यान्तु सर्वे दुर्योधनादयः ।। १९ ।।
यैरियं पृथिवी कृत्स्ना घातिता कुलपांसनैः ।
‘जिन कुलांगारोंने इस सारी पृथिवीका विनाश करा डाला, वे दुर्योधन आदि सब लोग भारी-से-भारी कष्टमें पड़ जायँ’ ।। १९ १/२ ।।
कुतस्त्वमसि विस्मृत्य वैरं द्वादशवार्षिकम् ।। २० ।।
अज्ञातवासं गहनं द्रौपदीशोकवर्धनम् ।
‘तुम वह पुराना वैर, वह बारह वर्षोंका वनवास और द्रौपदीके शोकको बढ़ानेवाला एक वर्षका गहन अज्ञातवास सहसा भूल कैसे गये? ।। २० १/२ ।।
क्व तदा धृतराष्ट्रस्य स्नेहोऽस्मद्गोचरो गतः ।। २१ ।।
कृष्णाजिनोपसंवीतो हृताभरणभूषणः ।
सार्धं पाञ्चालपुत्र्या त्वं राजानमुपजग्मिवान् ।। २२ ।।
क्व तदा द्रोणभीष्मौ तौ सोमदत्तोऽपि वाभवत् ।
‘उन दिनों धृतराष्ट्रका हमारे प्रति स्नेह कहाँ चला गया था? जब तुम्हारे आभरण एवं आभूषण उतार लिये गये और तुम काले मृगचर्मसे अपने शरीरको ढँककर द्रौपदीके साथ राजाके समीप गये, उस समय द्रोणाचार्य और भीष्म कहाँ थे? सोमदत्तजी भी कहाँ चले गये थे ।। २१-२२ १/२ ।।
यत्र त्रयोदशसमा वने वन्येन जीवथ ।। २३ ।।
न तदा त्वां पिता ज्येष्ठः पितृत्वेनाभिवीक्षते ।
‘जब तुम सब लोग तेरह वर्षोंतक वनमें जंगली फल-मूल खाकर किसी तरह जी रहे थे, उन दिनों तुम्हारे ये ताऊजी पिताके भावसे तुम्हारी ओर नहीं देखते थे ।।
किं ते तद् विस्मृतं पार्थ यदेष कुलपांसनः ।। २४ ।।
दुर्बुद्धिर्विदुरं प्राह द्यूते किं जितमित्युत ।