महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2387, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंएकत्रिशोऽध्यायः
व्यासजीके द्वारा धृतराष्ट्र आदिके पूर्वजन्मका परिचय तथा उनके कहनेसे सब लोगोंका गङ्गा-तटपर जाना
व्यास उवाच
भद्रे द्रक्ष्यसि गान्धारि पुत्रान् भ्रातॄन् सखींस्तथा ।
वधूश्च पतिभिः सार्धं निशि सुप्तोत्थिता इव ।। १ ।।
व्यासजीने कहा— भद्रे गान्धारि! आज रातमें तुम अपने पुत्रों, भाइयों और उनके मित्रोंको देखोगी। तुम्हारी वधुएँ तुम्हें पतियोंके साथ-साथ सोकर उठी हुई-सी दिखायी देंगी ।। १ ।।
कर्णं द्रक्ष्यति कुन्ती च सौभद्रं चापि यादवी ।
द्रौपदी पञ्च पुत्रांश्च पितॄन् भ्रातूंस्तथैव च ।। २ ।।
कुन्ती कर्णको, सुभद्रा अभिमन्युको तथा द्रौपदी पाँचों पुत्रोंको, पिताको और भाइयोंको भी देखेगी ।। २ ।।
पूर्वमेवैष हृदये व्यवसायोऽभवन्मम ।
यदास्मि चोदितो राज्ञा भवत्या पृथयैव च ।। ३ ।।
जब राजा धृतराष्ट्रने, तुमने और कुन्तीने भी मुझे इसके लिये प्रेरित किया था, उससे पहले ही मेरे हृदयमें यह (मृत व्यक्तियोंके दर्शन करानेका) निश्चय हो गया था ।। ३ ।।
न ते शोच्या महात्मानः सर्व एव नरर्षभाः ।
क्षत्रधर्मपराः सन्तस्तथा हि निधनं गताः ।। ४ ।।
तुम्हें क्षत्रिय-धर्मपरायण होकर तदनुसार ही वीरगतिको प्राप्त हुए उन समस्त महामनस्वी, नरश्रेष्ठ वीरोंके लिये कदापि शोक नहीं करना चाहिये ।। ४ ।।
भवितव्यमवश्यं तत् सुरकार्यमनिन्दिते ।
अवतेरुस्ततः सर्वे देवभागा महीतलम् ।। ५ ।।
सती-साध्वी देवि! यह देवताओंका कार्य था और इसी रूपमें अवश्य होनेवाला था; इसलिये सभी देवताओंके अंश इस पृथ्वीपर अवतीर्ण हुए थे ।। ५ ।।
गन्धर्वाप्सरसश्चैव पिशाचा गुह्यराक्षसाः ।
तथा पुण्यजनाश्चैव सिद्धा देवर्षयोऽपि च ।। ६ ।।
देवाश्च दानवाश्चैव तथा देवर्षयोऽमलाः ।
त एते निधनं प्राप्ताः कुरुक्षेत्रे रणाजिरे ।। ७ ।।