महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2509, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ें‘महाबाहु युधिष्ठिर! तुम्हें राजा दुर्योधनके प्रति किसी तरह ऐसी बात मुँहसे नहीं निकालनी चाहिये। मेरी इस बातको ध्यान देकर सुनो ॥ १२ ॥
एष दुर्योधनो राजा पूज्यते त्रिदशैः सह । सद्भिश्च राजप्रवरैर्य इमे स्वर्गवासिनः ॥ १३ ॥
‘ये राजा दुर्योधन देवताओंसहित उन श्रेष्ठ नरेशोंद्वारा भी पूजित एवं सम्मानित होते हैं, जो कि ये चिरकालसे स्वर्गलोकमें निवास करते हैं ॥ १३ ॥
वीरलोकगतिः प्राप्ता युद्धे हुत्वाऽऽत्मनस्तनुम् । यूयं सर्वे सुरसमा येन युद्धे समासिताः ॥ १४ ॥ स एष क्षत्रधर्मेण स्थानमेतदवाप्तवान् । भये महति योऽभीतो बभूव पृथिवीपतिः ॥ १५ ॥
‘इन्होंने युद्धमें अपने शरीरकी आहुति देकर वीरोंकी गति पायी है। जिन्होंने युद्धमें देवतुल्य तेजस्वी तुम समस्त भाइयोंका डटकर सामना किया है, जो पृथिवीपति दुर्योधन महान् भयके समय भी निर्भय बने रहे, उन्होंने क्षत्रियधर्मके अनुसार यह स्थान प्राप्त किया है ॥ १४-१५ ॥
न तन्मनसि कर्तव्यं पुत्र यद् द्यूतकारितम् । द्रौपद्याश्च परिक्लेशं न चिन्तयितुमर्हसि ॥ १६ ॥
‘वत्स! इनके द्वारा जुएमें जो अपराध हुआ है, उसे अब तुम्हें मनमें नहीं लाना चाहिये। द्रौपदीको भी इनसे जो क्लेश प्राप्त हुआ है इसे अब तुम्हें भुला देना चाहिये ॥ १६ ॥
ये चान्येऽपि परिक्लेशा युष्माकं ज्ञातिकारिताः । संग्रामेष्वथ वान्यत्र न तान् संस्मर्तुमर्हसि ॥ १७ ॥
‘तुम लोगोंको अपने भाई-बन्धुओंसे युद्धमें या अन्यत्र और भी जो कष्ट उठाने पड़े हैं, उन सबको यहाँ याद रखना तुम्हारे लिये उचित नहीं है ॥ १७ ॥
समागच्छ यथान्यायं राज्ञा दुर्योधनेन वै । स्वर्गोऽयं नेह वैराणि भवन्ति मनुजाधिप ॥ १८ ॥
‘अब तुम राजा दुर्योधनके साथ न्यायपूर्वक मिलो। नरेश्वर! यह स्वर्गलोक है, यहाँ पहलेके वैर-विरोध नहीं रहते हैं’ ॥ १८ ॥
नारदेनैवमुक्तस्तु कुरुराजो युधिष्ठिरः । भ्रातॄन् पप्रच्छ मेधावी वाक्यमेतदुवाच ह ॥ १९ ॥
नारदजीके ऐसा कहनेपर बुद्धिमान् कुरुराज युधिष्ठिरने अपने भाइयोंका पता पूछा और यह बात कही— ॥ १९ ॥
यदि दुर्योधनस्यैते वीरलोकाः सनातनाः । अधर्मज्ञस्य पापस्य पृथिवीसुहृदां द्रुहः ॥ २० ॥ यत्कृते पृथिवी नष्टा सहया सनराद्विपा ।