महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 274, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंअष्टादशोऽध्यायः
शिवसहस्रनामके पाठकी महिमा तथा ऋषियोंका भगवान् शंकरकी कृपासे अभीष्ट सिद्धि होनेके विषयमें अपना-अपना अनुभव सुनाना और श्रीकृष्णके द्वारा भगवान् शिवजीकी महिमाका वर्णन
वैशम्पायन उवाच
महायोगी ततः प्राह कृष्णद्वैपायनो मुनिः ।
पठस्व पुत्र भद्रं ते प्रीयतां ते महेश्वरः ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! तदनन्तर महायोगी श्रीकृष्णद्वैपायन मुनिवर व्यासने युधिष्ठिरसे कहा—‘बेटा! तुम्हारा कल्याण हो। तुम भी इस स्तोत्रका पाठ करो, जिससे तुम्हारे ऊपर भी महेश्वर प्रसन्न हों ॥ १ ॥
पुरा पुत्र मया मेरौ तप्यता परमं तपः ।
पुत्रहेतोर्महाराज स्तव एषोऽनुकीर्तितः ॥ २ ॥
‘पुत्र! महाराज! पूर्वकालकी बात है, मैंने पुत्रकी प्राप्तिके लिये मेरुपर्वतपर बड़ी भारी तपस्या की थी। उस समय मैंने इस स्तोत्रका अनेक बार पाठ किया था ॥ २ ॥
लब्ध्वानीप्सितान् कामानहं वै पाण्डुनन्दन ।
तथा त्वमपि शर्वाद्धि सर्वान् कामानवाप्स्यसि ॥ ३ ॥
‘पाण्डुनन्दन! इसके पाठसे मैंने अपनी मनोवांछित कामनाओंको प्राप्त कर लिया था। उसी प्रकार तुम भी शंकरजीसे सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर लोगे’ ॥ ३ ॥
कपिलश्च ततः प्राह सांख्यर्षिर्देवसम्मतः ।
मया जन्मान्यनेकानि भक्त्या चाराधितो भवः ॥ ४ ॥
प्रीतश्च भगवान् ज्ञानं ददौ मम भवान्तकम् ।
‘तत्पश्चात् वहाँ सांख्यके आचार्य देवसम्मानित कपिलने कहा—‘मैंने भी अनेक जन्मोंतक भक्तिभावसे भगवान् शंकरकी आराधना की थी। इससे प्रसन्न होकर भगवान्ने मुझे भवभयनाशक ज्ञान प्रदान किया था’ ॥ ४ १/२ ॥
चारुशीर्षस्ततः प्राह शक्रस्य दयितः सखा ।
आलम्बायन इत्येवं विश्रुतः करुणात्मकः ॥ ५ ॥
तदनन्तर इन्द्रके प्रिय सखा आलम्बगोत्रीय चारुशीर्षने जो आलम्बायन नामसे ही प्रसिद्ध तथा परम दयालु हैं, इस प्रकार कहा— ॥ ५ ॥
मया गोकर्णमासाद्य तपस्तप्त्वा शतं समाः ।