महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 308, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंएकविंशोऽध्यायः
अष्टावक्र और उत्तरदिशाका संवाद, अष्टावक्रका अपने घर लौटकर वदान्य ऋषिकी कन्याके साथ विवाह करना
युधिष्ठिर उवाच
न बिभेति कथं सा स्त्री शापाच्च परमद्युतेः।
कथं निवृत्तो भगवांस्तद् भवान् प्रब्रवीतु मे ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— पितामह! वह स्त्री उन महातेजस्वी ऋषिके शापसे डरती कैसे नहीं थी; और वे भगवान् अष्टावक्र किस तरह वहाँसे लौटे थे? यह सब मुझे बताइये ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
अष्टावक्रोऽन्वपृच्छत् तां रूपं विकुरुषे कथम्।
न चानृतं ते वक्तव्यं ब्रूहि ब्राह्मणकाम्यया ॥ २ ॥
भीष्मजीने कहा— राजन्! सुनो, अष्टावक्रने उस स्त्रीसे पूछा, 'तुम अपना रूप बदलती क्यों रहती हो? बताओ, यदि मुझ-जैसे ब्राह्मणसे सम्मान पानेकी इच्छा हो तो झूठ न बोलना' ॥ २ ॥
स्त्र्युवाच
द्यावापृथिव्योर्यत्रैषा काम्या ब्राह्मणसत्तम।
शृणुष्वावहितः सर्वं यदिदं सत्यविक्रम ॥ ३ ॥
स्त्री बोली— ब्राह्मणशिरोमणे! स्वर्गलोक हो या मर्त्यलोक, जिस किसी भी स्थानमें स्त्री और पुरुष निवास करते हैं, वहाँ उनमें परस्पर संयोगकी यह कामना सदा बनी रहती है। सत्यपराक्रमी विप्र! यह सब जो रूपपरिवर्तनकी लीला की गयी है, उसका कारण बताती हूँ, सावधान होकर सुनिये ॥ ३ ॥
जिज्ञासेयं प्रयुक्ता मे स्थिरीकर्तुं तवानघ।
अव्युत्थानेन ते लोका जिताः सत्यपराक्रम ॥ ४ ॥
निर्दोष ब्राह्मण! आपको दृढ़ करनेके लिये आपकी परीक्षा लेनेके उद्देश्यसे ही मैंने यह कार्य किया है। सत्यपराक्रमी द्विज! आपने अपने धर्मसे विचलित न होकर समस्त पुण्यलोकोंको जीत लिया है ॥ ४ ॥
उत्तरां मां दिशं विद्धि दृष्टं स्त्रीचापलं च ते।
स्थविराणामपि स्त्रीणां बाधते मैथुनज्वरः ॥ ५ ॥
आप मुझे उत्तरदिशा समझें। स्त्रीमें कितनी चपलता होती है—यह आपने प्रत्यक्ष देखा है। बूढ़ी स्त्रियोंको भी मैथुनके लिये होनेवाला कामजनित संताप कष्ट देता रहता है ॥ ५ ॥