भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 309, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 309

(अविश्वासान्न व्यसनी नातिसक्तोऽप्रवासकः । विद्वान् सुशीलः पुरुषः सदारः सुखमश्नुते ॥) जो कहीं भी विश्वास न करनेके कारण किसी व्यसनमें नहीं फँसता, कहीं भी अधिक आसक्त नहीं होता, परदेशमें नहीं रहता तथा जो विद्वान् और सुशील है, वही पुरुष स्त्रीके साथ रहकर सुख भोगता है ॥ तुष्टः पितामहस्तेऽद्य तथा देवाः सवासवाः । स त्वं येन च कार्येण सम्प्राप्तो भगवानिह ॥ ६ ॥ प्रेषितस्तेन विप्रेण कन्यापित्रा द्विजर्षभ । तवोपदेशं कर्तुं वै तच्च सर्वं कृतं मया ॥ ७ ॥ आज आपके ऊपर ब्रह्माजी तथा इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवता संतुष्ट हैं। भगवन् द्विजश्रेष्ठ! आप यहाँ जिस कार्यसे आये हैं, वह सफल हो गया। उस कन्याके पिता वदान्य ऋषिने मेरे पास आपको उपदेश देनेके लिये भेजा था। वह सब मैंने कर दिया ॥ ६-७ ॥ क्षेमैर्गमिष्यसि गृहं श्रमश्च न भविष्यति । कन्यां प्राप्स्यसि तां विप्र पुत्रिणी च भविष्यति ॥ ८ ॥ विप्रवर! अब आप कुशलपूर्वक अपने घरको जायँगे और मार्गमें आपको कोई श्रम अथवा कष्ट नहीं होगा। उस मनोनीत कन्याको आप प्राप्त कर लेंगे और आपके द्वारा वह पुत्रवती भी होगी ही ॥ ८ ॥ काम्यया पृष्टवांस्त्वं मां ततो व्याहृतमुत्तमम् । अनतिक्रमणीया सा कृत्स्नैर्लोकैस्त्रिभिः सदा ॥ ९ ॥ आपने जाननेकी इच्छासे मुझसे यह बात पूछी थी, इसलिये मैंने अच्छे ढंगसे सब कुछ बता दिया। तीनों लोकोंके सम्पूर्ण निवासियोंके लिये भी ब्राह्मणकी आज्ञा कदापि उल्लंघनीय नहीं होती ॥ ९ ॥ गच्छस्व सुकृतं कृत्वा किं चान्यच्छ्रोतुमिच्छसि । यावद् ब्रवीमि विप्रर्षे अष्टावक्र यथातथम् ॥ १० ॥ ब्रह्मर्षि अष्टावक्र! आप पुण्यका उपार्जन करके जाइये। और क्या सुनना चाहते हैं? कहिये, मैं वह सब कुछ यथार्थरूपसे बताऊँगी ॥ १० ॥ ऋषिणा प्रसादिता चास्मि तव हेतोर्द्विजर्षभ । तस्य सम्माननार्थं मे त्वयि वाक्यं प्रभाषितम् ॥ ११ ॥ द्विजश्रेष्ठ! वदान्य मुनिने आपके लिये मुझे प्रसन्न किया था; अतः उनके सम्मानके लिये ही मैंने ये सारी बातें कही हैं ॥ ११ ॥ भीष्म उवाच श्रुत्वा तु वचनं तस्याः स विप्रः प्राञ्जलिः स्थितः ।