भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 310, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 310

अनुज्ञातस्तया चापि स्वगृहं पुनराव्रजत् ॥ १२ ॥ **भीष्मजी कहते हैं—**भारत! उस स्त्रीकी बात सुनकर विप्रवर अष्टावक्र उसके सामने हाथ जोड़कर खड़े हो गये। फिर उसकी आज्ञा ले पुनः अपने घरको लौट आये ॥ १२ ॥ गृहमागत्य विश्रान्तः स्वजनं परिपृच्छ्य च । अभ्यगच्छच्च तं विप्रं न्यायतः कुरुनन्दन ॥ १३ ॥ कुरुनन्दन! घर आकर उन्होंने विश्राम किया और स्वजनोंसे पूछकर वे न्यायानुसार फिर ब्राह्मण वदान्यके घर गये ॥ १३ ॥ पृष्टश्च तेन विप्रेण दृष्टं त्वेतन्निदर्शनम् । प्राह विप्रं तदा विप्रः सुप्रीतेनान्तरात्मना ॥ १४ ॥ ब्राह्मणने उनकी यात्राके विषयमें पूछा, तब उन्होंने प्रसन्नचित्तसे जो कुछ वहाँ देखा था, सब बताना आरम्भ किया— ॥ १४ ॥ भवता समनुज्ञातः प्रास्थितो गन्धमादनम् । तस्य चोत्तरतो देशे दृष्टं मे दैवतं महत् ॥ १५ ॥ तया चाहमनुज्ञातो भवांश्चापि प्रकीर्तितः । श्रावितश्चापि तद्वाक्यं गृहं चाभ्यागतः प्रभोः ॥ १६ ॥ 'महर्षे! आपकी आज्ञा पाकर मैं उत्तर दिशामें गन्ध-मादनपर्वतकी ओर चल दिया। उससे भी उत्तर जानेपर मुझे एक महती देवीका दर्शन हुआ। उसने मेरी परीक्षा ली और आपका भी परिचय दिया। प्रभो! फिर उसने अपनी बात सुनायी और उसकी आज्ञा लेकर मैं अपने घर आ गया' ॥ तमुवाच तदा विप्रः सुतां प्रतिगृहाण मे । नक्षत्रविधियोगेन पात्रं हि परमं भवान् ॥ १७ ॥ तब ब्राह्मण वदान्यने कहा—'आप उत्तम नक्षत्रमें विधिपूर्वक मेरी पुत्रीका पाणिग्रहण कीजिये; क्योंकि आप अत्यन्त सुयोग्य पात्र हैं' ॥ १७ ॥

भीष्म उवाच

अष्टावक्रस्तथेत्युक्त्वा प्रतिगृह्य च तां प्रभो । कन्यां परमधर्मात्मा प्रीतिमांश्चाभवत् तदा ॥ १८ ॥ **भीष्मजी कहते हैं—**प्रभो! तदनन्तर 'तथास्तु' कहकर परम धर्मात्मा अष्टावक्रने उस कन्याका पाणिग्रहण किया। इससे उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई ॥ १८ ॥ कन्यां तां प्रतिगृह्यैव भार्यां परमशोभनाम् । उवास मुदितस्तत्र स्वाश्रमे विगतज्वरः ॥ १९ ॥ उस परम सुन्दरी कन्याका पत्नीरूपमें दान पाकर अष्टावक्र मुनिकी सारी चिन्ता दूर हो गयी और वे अपने आश्रममें उसके साथ आनन्दपूर्वक रहने लगे ॥ १९ ॥