महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 312, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्वाविंशोऽध्यायः
युधिष्ठिरके विविध धर्मयुक्त प्रश्नोंका उत्तर तथा श्राद्ध और दानके उत्तम पात्रोंका लक्षण
[मार्कण्डेयजीके द्वारा विविध प्रश्न और नारदजीके द्वारा उनका उत्तर]
(युधिष्ठिर उवाच)
पुत्रैः कथं महाराज पुरुषस्तरिता भवेत् ।
यावन्न लब्धवान् पुत्रमफलः पुरुषो नृप ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**नरेश्वर! महाराज! पुत्रोंद्वारा पुरुषका कैसे उद्धार होता है? जबतक पुत्रकी प्राप्ति न हो तबतक पुरुषका जीवन निष्फल क्यों माना जाता है? ।।
भीष्म उवाच
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
नारदेन पुरा गीतं मार्कण्डेयाय पृच्छते ॥
**भीष्मजीने कहा—**राजन्! इस विषयमें इस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया जाता है। पूर्वकालमें मार्कण्डेयके पूछनेपर देवर्षि नारदने जो उपदेश दिया था, उसीका इस इतिहासमें उल्लेख हुआ है ।।
पर्वतं नारदं चैवमसितं देवलं च तम् ।
आरुणेयं च रैभ्यं च एतानत्रागतान् पुरा ॥
गङ्गायमुनयोर्मध्ये भोगवत्याः समागमे ।
दृष्ट्वा पूर्वसमासीनान् मार्कण्डेयोऽभ्यगच्छत ॥
पहलेकी बात है, गंगा-यमुनाके मध्यभागमें जहाँ भोगवतीका समागम हुआ है वहीं पर्वत, नारद, असित, देवल, आरुणेय और रैभ्य—ये ऋषि एकत्र हुए थे। इन सब ऋषियोंको वहाँ पहलेसे विराजमान देख मार्कण्डेयजी भी गये ।।
ऋषयस्तु मुनिं दृष्ट्वा समुत्थायोन्मुखाः स्थिताः ।
अर्चयित्वार्हतो विप्रं किं कुर्म इति चाब्रुवन् ॥
ऋषियोंने जब मुनिको आते देखा, तब वे सब-के-सब उठकर उनकी ओर मुख करके खड़े हो गये और उन ब्रह्मर्षिकी उनके योग्य पूजा करके सबने पूछा—'हम आपकी क्या सेवा करें?' ।।
मार्कण्डेय उवाच
अयं समागमः सद्भिर्यत्नेनासादितो मया ।