महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअत्र प्राप्स्यामि धर्माणामाचारस्य च निश्चयम् ।। **मार्कण्डेयजीने कहा—**मैंने बड़े यत्नसे सत्पुरुषोंका यह संग प्राप्त किया है। मुझे आशा है, यहाँ धर्म और आचारका निर्णय प्राप्त होगा ।। ऋजुः कृतयुगे धर्मस्तस्मिन् क्षीणे विमुह्यति । युगे युगे महर्षिभ्यो धर्ममिच्छामि वेदितुम् ।। सत्ययुगमें धर्मका अनुष्ठान सरल होता है। उस युगके समाप्त हो जानेपर धर्मका स्वरूप मनुष्योंके मोहसे आच्छन्न हो जाता है; अतः प्रत्येक युगके धर्मका क्या स्वरूप है? इसे मैं आप सब महर्षियोंसे जानना चाहता हूँ ।।
भीष्म उवाच
ऋषिभिर्नारदः प्रोक्तो ब्रूहि यत्रास्य संशयः । धर्माधर्मेषु तत्त्वज्ञ त्वं विच्छेत्तासि संशयान् ।। **भीष्मजी कहते हैं—**राजन्! तब सब ऋषियोंने मिलकर नारदजीसे कहा—'तत्त्वज्ञ देवर्षे! मार्कण्डेयजीको जिस विषयमें संदेह है उसका आप निरूपण कीजिये। क्योंकि धर्म और अधर्मके विषयमें होनेवाले समस्त संशयोंका निवारण करनेमें आप समर्थ हैं' ।। ऋषिभ्योऽनुमतो वाक्यं नियोगान्नारदोऽब्रवीत् । सर्वधर्मार्थतत्त्वज्ञं मार्कण्डेयं ततोऽब्रवीत् ।। ऋषियोंकी यह अनुमति और आदेश पाकर नारदजीने सम्पूर्ण धर्म और अर्थके तत्त्वको जाननेवाले मार्कण्डेयजीसे पूछा ।।
नारद उवाच
दीर्घायो तपसा दीप्त वेदवेदाङ्गतत्त्ववित् । यत्र ते संशयो ब्रह्मन् समुत्पन्नः स उच्यताम् ।। **नारदजी बोले—**तपस्यासे प्रकाशित होनेवाले दीर्घायु मार्कण्डेयजी! आप तो स्वयं ही वेदों और वेदांगोंके तत्त्वको जाननेवाले हैं, तथापि ब्रह्मन्! जहाँ आपको संशय उत्पन्न हुआ हो वह विषय उपस्थित कीजिये ।। धर्मं लोकोपकारं वा यच्चान्यच्छ्रोतुमिच्छसि । तदहं कथयिष्यामि ब्रूहि त्वं सुमहातपाः ।। महातपस्वी महर्षे! धर्म, लोकोपकार अथवा और जिस किसी विषयमें आप सुनना चाहते हों उसे कहिये। मैं उस विषयका निरूपण करूँगा ।।
मार्कण्डेय उवाच
युगे युगे व्यतीतेऽस्मिन् धर्मसेतुः प्रणश्यति । कथं धर्मच्छलेनाहं प्राप्नुयामिति मे मतिः ।।