महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 314, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ें**मार्कण्डेयजी बोले—**प्रत्येक युगके बीत जानेपर धर्मकी मर्यादा नष्ट हो जाती है। फिर धर्मके बहानेसे अधर्म करनेपर मैं उस धर्मका फल कैसे प्राप्त कर सकता हूँ? मेरे मनमें यही प्रश्न उठता है ।।
नारद उवाच
आसीद् धर्मः पुरा विप्र चतुष्पादः कृते युगे । ततो ह्यधर्मः कालेन प्रवृत्तः किञ्चिदुन्नतः ।। **नारदजीने कहा—**विप्रवर! पहले सत्ययुगमें धर्म अपने चारों पैरोंसे युक्त होकर सबके द्वारा पालित होता था। तदनन्तर समयानुसार अधर्मकी प्रवृत्ति हुई और उसने अपना सिर कुछ ऊँचा किया ।। ततस्त्रेतायुगं नाम प्रवृत्तं धर्मदूषणम् । तस्मिन् व्यतीते सम्प्राप्तं तृतीयं द्वापरं युगम् ।। तदा धर्मस्य द्वौ पादावधर्मो नाशयिष्यति । तदनन्तर धर्मको अंशतः दूषित करनेवाले त्रेतानामक दूसरे युगकी प्रवृत्ति हुई। जब वह भी बीत गया तब तीसरे युग द्वापरका पदार्पण हुआ। उस समय धर्मके दो पैरोंको अधर्म नष्ट कर देता है ।। द्वापरे तु परिक्षीणे नन्दिके समुपस्थिते ।। लोकवृत्तं च धर्मं च उच्यमानं निबोध मे । द्वापरके नष्ट होनेपर जब नन्दिक (कलियुग) उपस्थित होता है उस समय लोकाचार और धर्मका जैसा स्वरूप रह जाता है, उसे बताता हूँ, सुनिये ।। चतुर्थं नन्दिकं नाम धर्मः पादावशेषितः ।। ततः प्रभृति जायन्ते क्षीणप्रज्ञायुषो नराः । क्षीणप्राणधना लोके धर्माचारबहिष्कृताः ।। चौथे युगका नाम है नन्दिक। उस समय धर्मका एक ही पाद (अंश) शेष रह जाता है। तभीसे मन्दबुद्धि और अल्पायु मनुष्य उत्पन्न होने लगते हैं। लोकमें उनकी प्राणशक्ति बहुत कम हो जाती है। वे निर्धन तथा धर्म और सदाचारसे बहिष्कृत होते हैं ।।
मार्कण्डेय उवाच
एवं विलुलिते धर्मे लोके चाधर्मसंयुते । किं चतुर्वर्णनियतं हव्यं कव्यं न नश्यति ।। **मार्कण्डेयजीने पूछा—**जब इस प्रकार धर्मका लोप होकर जगत्में अधर्म छा जाता है तब चारों वर्णोंके लिये नियत हव्य और कव्यका नाश क्यों नहीं हो जाता है? ।।
नारद उवाच