भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 315, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 315

मन्त्रपूतं सदा हव्यं कव्यं चैव न नश्यति । प्रतिगृह्णन्ति तद् देवा दातुर्न्यायात् प्रयच्छतः ॥ **नारदजीने कहा—**वेदमन्त्रसे सदा पवित्र होनेके कारण हव्य और कव्य नहीं नष्ट होते हैं। यदि दाता न्यायपूर्वक उनका दान करते हैं तो देवता और पितर उन्हें सादर ग्रहण करते हैं॥ सत्त्वयुक्तश्च दाता च सर्वान् कामानवाप्नुयात् । अवाप्तकामः स्वर्गे च महीयेत यथेप्सितम् ॥ जो दाता सात्त्विक भावसे युक्त होता है, वह इस लोकमें सम्पूर्ण मनोवाञ्छित कामनाओंको प्राप्त कर लेता है। यहाँ आप्तकाम होकर वह स्वर्गमें भी अपनी इच्छाके अनुसार सम्मानित होता है॥

मार्कण्डेय उवाच

चत्वारो ह्यथ ये वर्णा हव्यं कव्यं प्रदास्यते । मन्त्रहीनमवज्ञातं तेषां दत्तं क्व गच्छति ॥ **मार्कण्डेयजीने पूछा—**यहाँ जो चार वर्णके लोग हैं, उनके द्वारा यदि मन्त्ररहित और अवहेलना-पूर्वक हव्य-कव्यका दान दिया जाय तो उनका वह दान कहाँ जाता है? ॥

नारद उवाच

असुरान् गच्छते दत्तं विप्रै रक्षांसि क्षत्रियैः । वैश्यैः प्रेतानि वै दत्तं शूद्रैर्भूतानि गच्छति ॥ **नारदजीने कहा—**यदि ब्राह्मणोंने वैसा दान किया है तो वह असुरोंको प्राप्त होता है, क्षत्रियोंने किया है तो उसे राक्षस ले जाते हैं, वैश्योंद्वारा किये गये वैसे दानको प्रेत ग्रहण करते हैं और शूद्रोंद्वारा किया गया अवज्ञापूर्वक दान भूतोंको प्राप्त होता है॥

मार्कण्डेय उवाच

अथ वर्णावरे जाताश्चातुर्वर्ण्योपदेशिनः । दास्यन्ति हव्यकव्यानि तेषां दत्तं क्व गच्छति ॥ **मार्कण्डेयजीने पूछा—**जो नीच वर्णमें उत्पन्न होकर चारों वर्णोंको उपदेश देते और हव्य-कव्यका दान देते हैं, उनका दिया हुआ दान कहाँ जाता है? ॥

नारद उवाच

वर्णावराणां भूतानां हव्यकव्यप्रदातृणाम् । नैव देवा न पितरः प्रतिगृह्णन्ति तत् स्वयम् ॥ **नारदजीने कहा—**जब नीच वर्णके लोग हव्य-कव्यका दान करते हैं, तब उनके उस दानको न देवता ग्रहण करते हैं न पितर॥