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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

अत्र प्राप्स्यामि धर्माणामाचारस्य च निश्चयम् ।। **मार्कण्डेयजीने कहा—**मैंने बड़े यत्नसे सत्पुरुषोंका यह संग प्राप्त किया है। मुझे आशा है, यहाँ धर्म और आचारका निर्णय प्राप्त होगा ।। ऋजुः कृतयुगे धर्मस्तस्मिन् क्षीणे विमुह्यति । युगे युगे महर्षिभ्यो धर्ममिच्छामि वेदितुम् ।। सत्ययुगमें धर्मका अनुष्ठान सरल होता है। उस युगके समाप्त हो जानेपर धर्मका स्वरूप मनुष्योंके मोहसे आच्छन्न हो जाता है; अतः प्रत्येक युगके धर्मका क्या स्वरूप है? इसे मैं आप सब महर्षियोंसे जानना चाहता हूँ ।।

भीष्म उवाच

ऋषिभिर्नारदः प्रोक्तो ब्रूहि यत्रास्य संशयः । धर्माधर्मेषु तत्त्वज्ञ त्वं विच्छेत्तासि संशयान् ।। **भीष्मजी कहते हैं—**राजन्! तब सब ऋषियोंने मिलकर नारदजीसे कहा—'तत्त्वज्ञ देवर्षे! मार्कण्डेयजीको जिस विषयमें संदेह है उसका आप निरूपण कीजिये। क्योंकि धर्म और अधर्मके विषयमें होनेवाले समस्त संशयोंका निवारण करनेमें आप समर्थ हैं' ।। ऋषिभ्योऽनुमतो वाक्यं नियोगान्नारदोऽब्रवीत् । सर्वधर्मार्थतत्त्वज्ञं मार्कण्डेयं ततोऽब्रवीत् ।। ऋषियोंकी यह अनुमति और आदेश पाकर नारदजीने सम्पूर्ण धर्म और अर्थके तत्त्वको जाननेवाले मार्कण्डेयजीसे पूछा ।।

नारद उवाच

दीर्घायो तपसा दीप्त वेदवेदाङ्गतत्त्ववित् । यत्र ते संशयो ब्रह्मन् समुत्पन्नः स उच्यताम् ।। **नारदजी बोले—**तपस्यासे प्रकाशित होनेवाले दीर्घायु मार्कण्डेयजी! आप तो स्वयं ही वेदों और वेदांगोंके तत्त्वको जाननेवाले हैं, तथापि ब्रह्मन्! जहाँ आपको संशय उत्पन्न हुआ हो वह विषय उपस्थित कीजिये ।। धर्मं लोकोपकारं वा यच्चान्यच्छ्रोतुमिच्छसि । तदहं कथयिष्यामि ब्रूहि त्वं सुमहातपाः ।। महातपस्वी महर्षे! धर्म, लोकोपकार अथवा और जिस किसी विषयमें आप सुनना चाहते हों उसे कहिये। मैं उस विषयका निरूपण करूँगा ।।

मार्कण्डेय उवाच

युगे युगे व्यतीतेऽस्मिन् धर्मसेतुः प्रणश्यति । कथं धर्मच्छलेनाहं प्राप्नुयामिति मे मतिः ।।

**मार्कण्डेयजी बोले—**प्रत्येक युगके बीत जानेपर धर्मकी मर्यादा नष्ट हो जाती है। फिर धर्मके बहानेसे अधर्म करनेपर मैं उस धर्मका फल कैसे प्राप्त कर सकता हूँ? मेरे मनमें यही प्रश्न उठता है ।।

नारद उवाच

आसीद् धर्मः पुरा विप्र चतुष्पादः कृते युगे । ततो ह्यधर्मः कालेन प्रवृत्तः किञ्चिदुन्नतः ।। **नारदजीने कहा—**विप्रवर! पहले सत्ययुगमें धर्म अपने चारों पैरोंसे युक्त होकर सबके द्वारा पालित होता था। तदनन्तर समयानुसार अधर्मकी प्रवृत्ति हुई और उसने अपना सिर कुछ ऊँचा किया ।। ततस्त्रेतायुगं नाम प्रवृत्तं धर्मदूषणम् । तस्मिन् व्यतीते सम्प्राप्तं तृतीयं द्वापरं युगम् ।। तदा धर्मस्य द्वौ पादावधर्मो नाशयिष्यति । तदनन्तर धर्मको अंशतः दूषित करनेवाले त्रेतानामक दूसरे युगकी प्रवृत्ति हुई। जब वह भी बीत गया तब तीसरे युग द्वापरका पदार्पण हुआ। उस समय धर्मके दो पैरोंको अधर्म नष्ट कर देता है ।। द्वापरे तु परिक्षीणे नन्दिके समुपस्थिते ।। लोकवृत्तं च धर्मं च उच्यमानं निबोध मे । द्वापरके नष्ट होनेपर जब नन्दिक (कलियुग) उपस्थित होता है उस समय लोकाचार और धर्मका जैसा स्वरूप रह जाता है, उसे बताता हूँ, सुनिये ।। चतुर्थं नन्दिकं नाम धर्मः पादावशेषितः ।। ततः प्रभृति जायन्ते क्षीणप्रज्ञायुषो नराः । क्षीणप्राणधना लोके धर्माचारबहिष्कृताः ।। चौथे युगका नाम है नन्दिक। उस समय धर्मका एक ही पाद (अंश) शेष रह जाता है। तभीसे मन्दबुद्धि और अल्पायु मनुष्य उत्पन्न होने लगते हैं। लोकमें उनकी प्राणशक्ति बहुत कम हो जाती है। वे निर्धन तथा धर्म और सदाचारसे बहिष्कृत होते हैं ।।

मार्कण्डेय उवाच

एवं विलुलिते धर्मे लोके चाधर्मसंयुते । किं चतुर्वर्णनियतं हव्यं कव्यं न नश्यति ।। **मार्कण्डेयजीने पूछा—**जब इस प्रकार धर्मका लोप होकर जगत्में अधर्म छा जाता है तब चारों वर्णोंके लिये नियत हव्य और कव्यका नाश क्यों नहीं हो जाता है? ।।

नारद उवाच

मन्त्रपूतं सदा हव्यं कव्यं चैव न नश्यति । प्रतिगृह्णन्ति तद् देवा दातुर्न्यायात् प्रयच्छतः ॥ **नारदजीने कहा—**वेदमन्त्रसे सदा पवित्र होनेके कारण हव्य और कव्य नहीं नष्ट होते हैं। यदि दाता न्यायपूर्वक उनका दान करते हैं तो देवता और पितर उन्हें सादर ग्रहण करते हैं॥ सत्त्वयुक्तश्च दाता च सर्वान् कामानवाप्नुयात् । अवाप्तकामः स्वर्गे च महीयेत यथेप्सितम् ॥ जो दाता सात्त्विक भावसे युक्त होता है, वह इस लोकमें सम्पूर्ण मनोवाञ्छित कामनाओंको प्राप्त कर लेता है। यहाँ आप्तकाम होकर वह स्वर्गमें भी अपनी इच्छाके अनुसार सम्मानित होता है॥

मार्कण्डेय उवाच

चत्वारो ह्यथ ये वर्णा हव्यं कव्यं प्रदास्यते । मन्त्रहीनमवज्ञातं तेषां दत्तं क्व गच्छति ॥ **मार्कण्डेयजीने पूछा—**यहाँ जो चार वर्णके लोग हैं, उनके द्वारा यदि मन्त्ररहित और अवहेलना-पूर्वक हव्य-कव्यका दान दिया जाय तो उनका वह दान कहाँ जाता है? ॥

नारद उवाच

असुरान् गच्छते दत्तं विप्रै रक्षांसि क्षत्रियैः । वैश्यैः प्रेतानि वै दत्तं शूद्रैर्भूतानि गच्छति ॥ **नारदजीने कहा—**यदि ब्राह्मणोंने वैसा दान किया है तो वह असुरोंको प्राप्त होता है, क्षत्रियोंने किया है तो उसे राक्षस ले जाते हैं, वैश्योंद्वारा किये गये वैसे दानको प्रेत ग्रहण करते हैं और शूद्रोंद्वारा किया गया अवज्ञापूर्वक दान भूतोंको प्राप्त होता है॥

मार्कण्डेय उवाच

अथ वर्णावरे जाताश्चातुर्वर्ण्योपदेशिनः । दास्यन्ति हव्यकव्यानि तेषां दत्तं क्व गच्छति ॥ **मार्कण्डेयजीने पूछा—**जो नीच वर्णमें उत्पन्न होकर चारों वर्णोंको उपदेश देते और हव्य-कव्यका दान देते हैं, उनका दिया हुआ दान कहाँ जाता है? ॥

नारद उवाच

वर्णावराणां भूतानां हव्यकव्यप्रदातृणाम् । नैव देवा न पितरः प्रतिगृह्णन्ति तत् स्वयम् ॥ **नारदजीने कहा—**जब नीच वर्णके लोग हव्य-कव्यका दान करते हैं, तब उनके उस दानको न देवता ग्रहण करते हैं न पितर॥

यातुधानाः पिशाचाश्च भूता ये चापि नैर्ऋताः ।
तेषां सा विहिता वृत्तिः पितृदैवतनिर्गता ॥
जो यातुधान, पिशाच, भूत और राक्षस हैं, उन्हींके लिये उस वृत्तिका विधान किया गया है। पितरों और देवताओंने वैसी वृत्तिका परित्याग कर दिया है ॥
तेषां सर्वप्रदातॄणां हव्यकव्यं समाहिताः ।
यत् प्रयच्छन्ति विधिवत् तद् वै भुञ्जन्ति देवताः ॥
जो सब कुछ देनेवाले और उस कर्मके अधिकारी हैं, वे एकाग्रचित्त होकर विधिपूर्वक जो हव्य और कव्य समर्पित करते हैं, उसे देवता और पितर ग्रहण करते हैं ॥

मार्कण्डेय उवाच

श्रुतं वर्णावरैर्दत्तं हव्यं कव्यं च नारद ।
सम्प्रयोगे च पुत्राणां कन्यानां च ब्रवीहि मे ॥
**मार्कण्डेयजीने पूछा—**नारदजी! नीच वर्णके दिये हुए हव्य और कव्योंकी जो दशा होती है, उसे मैंने सुन ली। अब पुत्रों और कन्याओंके विषयमें एवं इनके संयोगके विषयमें मुझे कुछ बातें बताइये ॥

नारद उवाच

कन्याप्रदानं पुत्राणां स्त्रीणां संयोगमेव च ।
आनुपूर्व्यान्मया सम्यगुच्यमानं निबोध मे ॥
**नारदजीने कहा—**अब मैं कन्या-विवाहके और पुत्रोंके विषयमें एवं स्त्रियोंके संयोगके विषयमें क्रमशः बता रहा हूँ, उसे सुनो ॥
जातमात्रा तु दातव्या कन्यका सदृशे वरे ।
काले दत्तासु कन्यासु पिता धर्मेण युज्यते ॥
जो कन्या उत्पन्न हो जाती है, उसे किसी योग्य वरको सौंप देना आवश्यक होता है। यदि ठीक समयपर कन्याओंका दान हो गया तो पिता धर्मफलका भागी होता है ॥
यस्तु पुष्पवतीं कन्यां बान्धवो न प्रयच्छति ।
मासि मासि गते बन्धुस्तस्या भ्रौणघ्न्यमाप्नुते ॥
जो भाई-बन्धु रजस्वलावस्थामें पहुँच जानेपर भी कन्याका किसी योग्य वरके साथ विवाह नहीं कर देता, वह उसके एक-एक मास बीतनेपर भ्रूणहत्याके फलका भागी होता है ॥
यस्तु कन्यां गृहे रुन्ध्याद् ग्राम्यैर्भोगैर्विवर्जिताम् ।
अवध्यातः स कन्याया बन्धुः प्राप्नोति भ्रूणहाम् ॥
जो भाई-बन्धु कन्याको विषय-भोगोंसे वंचित करके घरमें रोके रखता है, वह उस कन्याके द्वारा अनिष्ट चिन्तन किये जानेके कारण भ्रूणहत्याके पापका भागी होता है ॥

मार्कण्डेय उवाच

केन मङ्गलकृत्येषु विनियुज्यन्ति कन्यकाः ।
एतदिच्छामि विज्ञातुं तत्त्वेनेह महामुने ॥
**मार्कण्डेयजीने पूछा—**महामुने! किस कारणसे कन्याओंको मांगलिक कर्मोंमें नियुक्त किया जाता है? मैं इस बातको यथार्थरूपसे जानना चाहता हूँ ॥

नारद उवाच

नित्यं निवसते लक्ष्मीः कन्यकासु प्रतिष्ठिता ।
शोभना शुभयोग्या च पूज्या मङ्गलकर्मसु ॥
**नारदजीने कहा—**कन्याओंमें सदा लक्ष्मी निवास करती हैं। वे उनमें नित्य प्रतिष्ठित होती हैं; इसलिये प्रत्येक कन्या शोभासम्पन्न, शुभ कर्मके योग्य तथा मंगल कर्मोंमें पूजनीय होती है ॥

आकरस्थं यथा रत्नं सर्वकामफलोपगम् ।
तथा कन्या महालक्ष्मीः सर्वलोकस्य मङ्गलम् ॥
जैसे खानमें स्थित हुआ रत्न सम्पूर्ण कामनाओं एवं फलोंकी प्राप्ति करानेवाला होता है, उसी प्रकार महालक्ष्मीस्वरूपा कन्या सम्पूर्ण जगत्‌के लिये मंगल-कारिणी होती है ॥

एवं कन्या परा लक्ष्मी रतिस्तोषश्च देहिनाम् ।
महाकुलानां चारित्रं वृत्तेन निकषोपलम् ॥
इस तरह कन्याको लक्ष्मीका सर्वोत्कृष्ट रूप जानना चाहिये। उससे देहधारियोंको सुख और संतोषकी प्राप्ति होती है। वह अपने सदाचारके द्वारा उच्च कुलोंके चरित्रकी कसौटी समझी जाती है ॥

आनयित्वा स्वकाद् वर्णात् कन्यकां यो भजेन्नरः ।
दातारं हव्यकव्यानां पुत्रकं या प्रसूयते ॥
जो मनुष्य अपने ही वर्णकी कन्याको विवाहके द्वारा लाकर उसे पत्नीके स्थानपर प्रतिष्ठित करता है, उसकी वह साध्वी पत्नी हव्य-कव्य प्रदान करनेवाले पुत्रको जन्म देती है ॥

साध्वी कुलं वर्धयति साध्वी पुष्टिर्गृहे परा ।
साध्वी लक्ष्मी रतिः साक्षात् प्रतिष्ठा संततिस्तथा ॥
साध्वी स्त्री कुलकी वृद्धि करती है। साध्वी स्त्री घरमें परम पुष्टिरूप है तथा साध्वी स्त्री घरकी लक्ष्मी है, रति है, मूर्तिमती प्रतिष्ठा है तथा संतान-परम्पराकी आधार है ॥

मार्कण्डेय उवाच

कानि तीर्थानि भगवन् नृणां देहाश्रितानि वै ।
तानि वै शंस भगवन् याथातथ्येन पृच्छतः ॥

**मार्कण्डेयजीने पूछा—**भगवन्! मनुष्योंके शरीरमें कौन-कौन-से तीर्थ हैं? मैं यह जानना चाहता हूँ। अतः आप यथार्थरूपसे मुझे बताइये।।

नारद उवाच

देवर्षिपितृतीर्थानि ब्राह्मं मध्येऽथ वैष्णवम्।
नृणां तीर्थानि पञ्चाहुः पाणौ संनिहितानि वै।।
**नारदजीने कहा—**मनीषी पुरुष कहते हैं, मनुष्योंके हाथमें ही पाँच तीर्थ हैं। उनके नाम इस प्रकार हैं—देवतीर्थ, ऋषितीर्थ, पितृतीर्थ, ब्राह्मतीर्थ और वैष्णवतीर्थ। (अंगुलियोंके अग्रभागमें देवतीर्थ है। कनिष्ठा और अनामिका अंगुलिके मूलभागमें आर्षतीर्थ है। इसीको कायतीर्थ और प्राजापत्यतीर्थ भी कहते हैं। अंगुष्ठ और तर्जनीके मध्यभागमें पितृतीर्थ है। अंगुष्ठके मूलभागमें ब्राह्मतीर्थ है और हथेलीके मध्यभागमें वैष्णवतीर्थ है।)।।
आद्यतीर्थं तु तीर्थानां वैष्णवो भाग उच्यते।
यत्रोपस्पृश्य वर्णानां चतुर्णां वर्धते कुलम्।।
पितृदैवतकार्याणि वर्धन्ते प्रेत्य चेह च।
हाथमें जो वैष्णवतीर्थका भाग है, उसे सब तीर्थोंमें प्रधान कहा जाता है। जहाँ जल रखकर आचमन करनेसे चारों वर्णोंके कुलकी वृद्धि होती है, तथा देवता और पितरोंके कार्यकी इहलोक और परलोकमें वृद्धि होती है।।

मार्कण्डेय उवाच

धर्मेष्वधिकृतानां तु नराणां मुह्यते मनः।
कथं न विघ्नं भवति एतदिच्छामि वेदितुम्।।
**मार्कण्डेयजीने पूछा—**जो धर्मके अधिकारी हैं, ऐसे मनुष्योंका मन कभी-कभी धर्मके विषयमें संशयापन्न हो जाता है। क्या करनेसे उनके धर्माचरणमें विघ्न न पड़े? यह मैं जानना चाहता हूँ।।

नारद उवाच

अर्थाश्च नार्यश्च समानमेत-
च्छ्रेयांसि पुंसामिह मोहयन्ति।
रतिप्रमोदात् प्रमदा हरन्ति
भोगैर्धनं चाप्युपहन्ति धर्मान्।।
**नारदजीने कहा—**धन और नारी दोनोंकी अवस्था एक-सी है। दोनों ही मनुष्योंको कल्याणके पथपर जानेमें बाधा देते हैं—उन्हें मोहित कर लेते हैं। रतिजनित आमोद-प्रमोदसे स्त्रियाँ मनको हर लेती हैं और धन भोगोंके द्वारा धर्मको चौपट कर देता है।।
हव्यं कव्यं च धर्मात्मा सर्वं तच्छ्रोत्रियोऽर्हति।

दत्तं हि श्रोत्रिये साधौ ज्वलिताग्नाविवाहुतिः ॥
धर्मात्मा श्रोत्रिय ब्राह्मण समस्त हव्य और कव्यको पानेका अधिकारी है। श्रेष्ठ श्रोत्रियको दिया हुआ हव्य-कव्य प्रज्वलित अग्निमें डाली हुई आहुतिके समान सफल होता है ॥

भीष्म उवाच

इति सम्भाष्य ऋषिभिर्मार्कण्डेयो महातपाः ।
नारदं चापि सत्कृत्य तेन चैवाभिसत्कृतः ॥
भीष्मजी कहते हैं— इस प्रकार ऋषियोंके साथ बात-चीत करके महातपस्वी मार्कण्डेयने नारदजीका सत्कार किया और स्वयं भी वे उनके द्वारा सम्मानित हुए ॥
आमन्त्रयित्वा ऋषिभिः प्रयायावाश्रमं मुनिः ।
ऋषयश्चापि तीर्थानां परिचर्यां प्रचक्रमुः ॥)
तत्पश्चात् ऋषियोंसे विदा लेकर मार्कण्डेय मुनि अपने आश्रमको चले गये तथा वे ऋषि भी तीर्थोंमें भ्रमण करने लगे ॥

[दाक्षिणात्य अध्याय समाप्त]

युधिष्ठिर उवाच

किमाहुर्भरतश्रेष्ठ पात्रं विप्राः सनातनाः ।
ब्राह्मणं लिङ्गिनं चैव ब्राह्मणं वाप्यलिङ्गिनम् ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— भरतश्रेष्ठ! प्राचीन ब्राह्मण किसको दानका श्रेष्ठ पात्र बताते हैं? दण्ड-कमण्डलु आदि चिह्न धारण करनेवाले ब्रह्मचारी ब्राह्मणको अथवा चिह्नरहित गृहस्थ ब्राह्मणको? ॥ १ ॥

भीष्म उवाच

स्ववृत्तिमभिपन्नाय लिङ्गिने चेतराय च ।
देयमाहुर्महाराज उभावेतौ तपस्विनौ ॥ २ ॥
भीष्मजीने कहा— महाराज! जीवन-रक्षाके लिये अपनी वर्णाश्रमोचित वृत्तिका आश्रय लेनेवाले चिह्नधारी या चिह्नरहित किसी भी ब्राह्मणको दान दिया जाना उचित बताया गया है; क्योंकि स्वधर्मका आश्रय लेनेवाले ये दोनों ही तपस्वी एवं दानपात्र हैं ॥ २ ॥

युधिष्ठिर उवाच

श्रद्धया परया पूतो यः प्रयच्छेद् द्विजातये ।
हव्यं कव्यं तथा दानं को दोषः स्यात् पितामह ॥ ३ ॥

**युधिष्ठिरने पूछा—**पितामह! जो केवल उत्कृष्ट श्रद्धासे ही पवित्र होकर ब्राह्मणको हव्य-कव्य तथा अन्य वस्तुका दान देता है, उसे अन्य प्रकारकी पवित्रता न होनेके कारण किस दोषकी प्राप्ति होती है? ।। ३ ।।

भीष्म उवाच

श्रद्धापूतो नरस्तात दुर्दान्तोऽपि न संशयः । पूतो भवति सर्वत्र किमुत त्वं महाद्युते ।। ४ ।। **भीष्मजीने कहा—**तात! मनुष्य जितेन्द्रिय न होनेपर भी केवल श्रद्धामात्रसे पवित्र हो जाता है—इसमें संशय नहीं है। महातेजस्वी नरेश! श्रद्धापूत मनुष्य सर्वत्र पवित्र होता है, फिर तुम-जैसे धर्मात्माके पवित्र होनेमें तो संदेह ही क्या है? ।। ४ ।।

युधिष्ठिर उवाच

न ब्राह्मणं परीक्षेत दैवेषु सततं नरः । कव्यप्रदाने तु बुधाः परीक्ष्यं ब्राह्मणं विदुः ।। ५ ।। **युधिष्ठिरने पूछा—**पितामह! विद्वानोंका कहना है कि देवकार्यमें कभी ब्राह्मणकी परीक्षा न करे, किंतु श्राद्धमें अवश्य उसकी परीक्षा करे; इसका क्या कारण है? ।। ५ ।।

भीष्म उवाच

न ब्राह्मणः साधयते हव्यं दैवात् प्रसिद्ध्यति । देवप्रसादादिज्यन्ते यजमानैर्न संशयः ।। ६ ।। **भीष्मजीने कहा—**बेटा! यज्ञ-होम आदि देवकार्यकी सिद्धि ब्राह्मणके अधीन नहीं है, वह दैवसे सिद्ध होता है। देवताओंकी कृपासे ही यजमान यज्ञ करते हैं। इसमें संशय नहीं है ।। ६ ।।

ब्राह्मणान् भरतश्रेष्ठ सततं ब्रह्मवादिनः । मार्कण्डेयः पुरा प्राह इति लोकेषु बुद्धिमान् ।। ७ ।। भरतश्रेष्ठ! बुद्धिमान् मार्कण्डेयजीने बहुत पहलेसे ही यह बता रखा है कि श्राद्धमें सदा वेदवेत्ता ब्राह्मणोंको ही निमन्त्रित करना चाहिये (क्योंकि उसकी सिद्धि सुपात्र ब्राह्मणके ही अधीन है) ।। ७ ।।

युधिष्ठिर उवाच

अपूर्वोऽप्यथवा विद्वान् सम्बन्धी वा यथा भवेत् । तपस्वी यज्ञशीलो वा कथं पात्रं भवेत् तु सः ।। ८ ।। **युधिष्ठिरने पूछा—**जो अपरिचित, विद्वान्, सम्बन्धी, तपस्वी अथवा यज्ञशील हों, इनमेंसे कौन किस प्रकारके गुणोंसे सम्पन्न होनेपर श्राद्ध एवं दानका उत्तम पात्र हो सकता है? ।। ८ ।।

भीष्म उवाच

कुलीनः कर्मकृद् वैद्यस्तथैवाप्यानृशंस्यवान् ।
ह्रीमानृजुः सत्यवादी पात्रं पूर्वे च ये त्रयः ॥ ९ ॥
**भीष्मजीने कहा—**कुलीन, कर्मठ, वेदोंके विद्वान्, दयालु, सलज्ज, सरल और सत्यवादी—इन सात प्रकारके गुणवाले जो पूर्वोक्त तीन (अपरिचित विद्वान्, सम्बन्धी और तपस्वी) ब्राह्मण हैं, वे उत्तम पात्र माने गये हैं ॥ ९ ॥

तत्रेमं शृणु मे पार्थ चतुर्णां तेजसां मतम् ।
पृथिव्याः काश्यपस्याग्नेर्मार्कण्डेयस्य चैव हि ॥ १० ॥
कुन्तीनन्दन! इस विषयमें तुम मुझसे पृथ्‍वी, काश्यप, अग्नि और मार्कण्डेय—इन चार तेजस्वी व्यक्तियोंका मत सुनो ॥ १० ॥

पृथिव्युवाच

यथा महार्णवे क्षिप्तः क्षिप्रं लेष्टुर्विनश्यति ।
तथा दुष्‍चरितं सर्वं त्रिवृत्यां च निमज्जति ॥ ११ ॥
**पृथ्‍वी कहती है—**जिस प्रकार महासागरमें फेंका हुआ ढेला तुरंत गलकर नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार याजन, अध्यापन और प्रतिग्रह—इन तीन वृत्तियोंसे जीविका चलानेवाले ब्राह्मणमें सारे दुष्कर्मोंका लय हो जाता है ॥ ११ ॥

काश्यप उवाच

सर्वे च वेदाः सह षड्भिरङ्गैः
सांख्यं पुराणं च कुले च जन्म ।
नैतानि सर्वाणि गतिर्भवन्ति
शीलव्यपेतस्य नृप द्विजस्य ॥ १२ ॥
**काश्यप कहते हैं—**नरेश्वर! जो ब्राह्मण शीलसे रहित हैं, उसे छहों अंगोंसहित वेद, सांख्य और पुराणका ज्ञान तथा उत्तम कुलमें जन्म—ये सब मिलकर भी उत्तम गति नहीं प्रदान कर सकते ॥ १२ ॥

अग्निरुवाच

अधीयानः पण्डितं मन्यमानो
यो विद्यया हन्ति यशः परेषाम् ।
प्रभ्रश्यतेऽसौ चरते न सत्यं
लोकास्तस्य ह्यन्तवन्तो भवन्ति ॥ १३ ॥
**अग्नि कहते हैं—**जो ब्राह्मण अध्ययन करके अपनेको बहुत बड़ा पण्डित मानता और अपनी विद्वत्तापर गर्व करने लगता है तथा जो अपनी विद्याके बलसे दूसरोंके यशका नाश

करता है, वह धर्मसे भ्रष्ट होकर सत्यका पालन नहीं करता; अतः उसे नाशवान् लोकोंकी प्राप्ति होती है ॥ १३ ॥

मार्कण्डेय उवाच

अश्वमेधसहस्रं च सत्यं च तुलया धृतम् ।
नाभिजानामि यद्यस्य सत्यस्यार्धमवाप्नुयात् ॥ १४ ॥
मार्कण्डेयजी कहते हैं— यदि तराजूके एक पलड़ेमें एक हजार अश्वमेध-यज्ञको और दूसरेमें सत्यको रखकर तौला जाय तो भी न जाने वे सारे अश्वमेध-यज्ञ इस सत्यके आधेके बराबर भी होंगे या नहीं? ॥ १४ ॥

भीष्म उवाच

इत्युक्त्वा ते जग्मुराशु चत्वारोऽमिततेजसः ।
पृथिवी काश्यपोऽग्निश्च प्रकृष्टायुश्च भार्गवः ॥ १५ ॥
भीष्मजी कहते हैं— युधिष्ठिर! इस प्रकार अपना मत प्रकट करके वे चारों अमिततेजस्वी व्यक्ति—पृथ्‍वी, काश्यप, अग्नि और मार्कण्डेय शीघ्र ही चले गये ॥ १५ ॥

युधिष्ठिर उवाच

यदि ते ब्राह्मणा लोके व्रतिनो भुञ्जते हविः ।
दत्तं ब्राह्मणकामाय कथं तत् सुकृतं भवेत् ॥ १६ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— पितामह! यदि ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करनेवाले ब्राह्मण श्राद्धमें हविष्यान्नका भोजन करते हैं तो श्रेष्ठ ब्राह्मणकी कामनासे उन्हें दिया हुआ दान कैसे सफल हो सकता है? ॥ १६ ॥

भीष्म उवाच

आदिष्टिनो ये राजेन्द्र ब्राह्मणा वेदपारगाः ।
भुञ्जते ब्रह्मकामाय व्रतलुप्ता भवन्ति ते ॥ १७ ॥
भीष्मजीने कहा— राजेन्द्र! (जिन्हें गुरुने नियत वर्षोंतक ब्रह्मचर्य-व्रत पालन करनेका आदेश दे रखा है वे आदिष्टी कहलाते हैं।) ऐसे वेदके पारङ्गत आदिष्टी ब्राह्मण यदि यजमानकी ब्राह्मणको दान देनेकी इच्छापूर्तिके लिये श्राद्धमें भोजन करते हैं तो उनका अपना ही व्रत नष्ट हो जाता है (इससे दाताका दान दूषित नहीं होता है)* ॥ १७ ॥

युधिष्ठिर उवाच

अनेकान्तं बहुद्वारं धर्ममाहुर्मनीषिणः ।
किंनिमित्तं भवेदत्र तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ १८ ॥

**युधिष्ठिरने पूछा—**पितामह! विद्वानोंका कहना है कि धर्मके साधन और फल अनेक प्रकारके हैं। पात्रके कौन-से गुण उसकी दानपात्रतामें कारण होते हैं? यह मुझे बताइये ॥ १८ ॥

भीष्म उवाच

अहिंसा सत्यमक्रोध आनृशंस्यं दमस्तथा ।
आर्जवं चैव राजेन्द्र निश्चितं धर्मलक्षणम् ॥ १९ ॥
**भीष्मजीने कहा—**राजेन्द्र! अहिंसा, सत्य, अक्रोध, कोमलता, इन्द्रियसंयम और सरलता—ये धर्मके निश्चित लक्षण हैं ॥ १९ ॥

ये तु धर्मं प्रशंसन्तश्चरन्ति पृथिवीमिमाम् ।
अनाचरन्तस्तद् धर्मं संकरेऽभिरताः प्रभो ॥ २० ॥
प्रभो! जो लोग इस पृथ्वीपर धर्मकी प्रशंसा करते हुए घूमते-फिरते हैं; परंतु स्वयं उस धर्मका आचरण नहीं करते, वे ढोंगी हैं और धर्मसंकरता फैलानेमें लगे हैं ॥ २० ॥

तेभ्यो हिरण्यं रत्नं वा गामश्वं वा ददाति यः ।
दश वर्षाणि विष्ठां स भुङ्क्ते निरयमास्थितः ॥ २१ ॥
ऐसे लोगोंको जो सुवर्ण, रत्न, गौ अथवा अश्व आदि वस्तुओंका दान करता है वह नरकमें पड़कर दस वर्षोंतक विष्ठा खाता है ॥ २१ ॥

मेदानां पुल्कसानां च तथैवान्तेवसायिनाम् ।
कृतं कर्माकृतं वापि रागमोहेन जल्पताम् ॥ २२ ॥
जो उच्चवर्णके लोग राग और मोहके वशीभूत हो अपने किये अथवा बिना किये शुभ कर्मका जनसमुदायमें वर्णन करते हैं वे मेद, पुल्कस तथा अन्त्यजोंके तुल्य माने जाते हैं ॥ २२ ॥

वैश्वदेवं च ये मूढा विप्राय ब्रह्मचारिणे ।
ददते नेह राजेन्द्र ते लोकान् भुञ्जतेऽशुभान् ॥ २३ ॥
राजेन्द्र! जो मूढ़ मानव ब्रह्मचारी ब्राह्मणको बलि-वैश्वदेवसम्बन्धी अन्न (अतिथियोंको देनेयोग्य हन्तकार) नहीं देते हैं, वे अशुभ लोकोंका उपभोग करते हैं ॥ २३ ॥

युधिष्ठिर उवाच

किं परं ब्रह्मचर्यं च किं परं धर्मलक्षणम् ।
किं च श्रेष्ठतमं शौचं तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ २४ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**पितामह! उत्तम ब्रह्मचर्य क्या है? धर्मका सबसे श्रेष्ठ लक्षण क्या है? तथा सर्वोत्तम पवित्रता किसे कहते हैं? यह मुझे बताइये ॥ २४ ॥

भीष्म उवाच

ब्रह्मचर्यात् परं तात मधुमांसस्य वर्जनम् ।
मर्यादायां स्थितो धर्मः शमश्चैवास्य लक्षणम् ॥ २५ ॥
भीष्मजीने कहा— तात! मांस और मदिराका त्याग ब्रह्मचर्यसे भी श्रेष्ठ है—वही उत्तम ब्रह्मचर्य है। वेदोक्त मर्यादामें स्थित रहना सबसे श्रेष्ठ धर्म है तथा मन और इन्द्रियोंको संयममें रखना ही सर्वोत्तम पवित्रता है ॥ २५ ॥

युधिष्ठिर उवाच
कस्मिन् काले चरेद् धर्मं कस्मिन् कालेऽर्थमाचरेत् ।
कस्मिन् काले सुखी च स्यात् तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ २६ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— पितामह! मनुष्य किस समय धर्मका आचरण करे? कब अर्थोपार्जनमें लगे तथा किस समय सुखभोगमें प्रवृत्त हो? यह मुझे बताइये ॥

भीष्म उवाच
कल्यमर्थं निषेवेत ततो धर्ममनन्तरम् ।
पश्चात् कामं निषेवेत न च गच्छेत् प्रसङ्गिताम् ॥ २७ ॥
भीष्मजीने कहा— राजन्! पूर्वाह्नमें धनका उपार्जन करे, तदनन्तर धर्मका और उसके बाद कामका सेवन करे; परंतु काममें आसक्त न हो ॥ २७ ॥

ब्राह्मणांश्चैव मन्येत गुरूंश्चाप्यभिपूजयेत् ।
सर्वभूतानुलोमश्च मृदुशीलः प्रियंवदः ॥ २८ ॥
ब्राह्मणोंका सम्मान करे। गुरुजनोंकी सेवा-पूजामें संलग्न रहे। सब प्राणियोंके अनुकूल रहे। नम्रताका बर्ताव करे और सबसे मीठे वचन बोले ॥ २८ ॥

अधिकारे यदनृतं यच्च राजसु पैशुनम् ।
गुरोश्चालीककरणं तुल्यं तद् ब्रह्महत्यया ॥ २९ ॥
न्यायका अधिकार पाकर झूठा फैसला देना अथवा न्यायालयमें जाकर झूठ बोलना, राजाओंके पास किसीकी चुगली करना और गुरुके साथ कपटपूर्ण बर्ताव करना—ये तीन ब्रह्महत्याके समान पाप हैं ॥ २९ ॥

प्रहरेन्न नरेन्द्रेषु न हन्याद् गां तथैव च ।
भ्रूणहत्यासमं चैव उभयं यो निषेवते ॥ ३० ॥
राजाओंपर प्रहार न करे और गायको न मारे। जो राजा और गौपर प्रहाररूप द्विविध दुष्कर्मका सेवन करता है, उसे भ्रूणहत्याके समान पाप लगता है ॥ ३० ॥

नाग्निं परित्यजेज्जातु न च वेदान् परित्यजेत् ।
न च ब्राह्मणमाक्रोशेत् समं तद् ब्रह्महत्यया ॥ ३१ ॥
अग्निहोत्रका कभी त्याग न करे। वेदोंका स्वाध्याय न छोड़े तथा ब्राह्मणकी निन्दा न करे; क्योंकि ये तीनों दोष ब्रह्महत्याके समान हैं ॥ ३१ ॥

युधिष्ठिर उवाच

कीदृशाः साधवो विप्राः केभ्यो दत्तं महाफलम् ।
कीदृशानां च भोक्तव्यं तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ ३२ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— पितामह! कैसे ब्राह्मणोंको श्रेष्ठ समझना चाहिये? किनको दिया हुआ दान महान् फल देनेवाला होता है? तथा कैसे ब्राह्मणोंको भोजन कराना चाहिये? यह मुझे बताइये ॥ ३२ ॥

भीष्म उवाच

अक्रोधना धर्मपराः सत्यनित्या दमे रताः ।
तादृशाः साधवो विप्रास्तेभ्यो दत्तं महाफलम् ॥ ३३ ॥
भीष्मजीने कहा— राजन्! जो क्रोधरहित, धर्मपरायण, सत्यनिष्ठ और इन्द्रियसंयममें तत्पर हैं, ऐसे ब्राह्मणोंको श्रेष्ठ समझना चाहिये और उन्हींको दान देनेसे महान् फलकी प्राप्ति होती है (अतः उन्हींको श्राद्धमें भोजन कराना चाहिये) ॥ ३३ ॥
अमानिनः सर्वसहा दृढार्था विजितेन्द्रियाः ।
सर्वभूतहिता मैत्रास्तेभ्यो दत्तं महाफलम् ॥ ३४ ॥
जिनमें अभिमानका नाम नहीं है, जो सब कुछ सह लेते हैं, जिनका विचार दृढ़ है, जो जितेन्द्रिय, सम्पूर्ण प्राणियोंके हितकारी तथा सबके प्रति मैत्रीभाव रखनेवाले हैं, उनको दिया हुआ दान महान् फल देनेवाला है ।।
अलुब्धाः शुचयो वैद्या ह्रीमन्तः सत्यवादिनः ।
स्वकर्मनिरता ये च तेभ्यो दत्तं महाफलम् ॥ ३५ ॥
जो निर्लोभ, पवित्र, विद्वान्, संकोची, सत्यवादी और अपने कर्तव्यका पालन करनेवाले हैं, उनको दिया हुआ दान भी महान् फलदायक होता है ॥ ३५ ॥
साङ्गांश्च चतुरो वेदानधीते यो द्विजर्षभः ।
षड्भ्यः प्रवृत्तः कर्मभ्यस्तं पात्रमृषयो विदुः ॥ ३६ ॥
जो श्रेष्ठ ब्राह्मण अंगोंसहित चारों वेदोंका अध्ययन करता और ब्राह्मणोचित छः कर्मों (अध्ययन-अध्यापन, यजन-याजन और दान-प्रतिग्रह) में प्रवृत्त रहता है, उसे ऋषिलोग दानका उत्तम पात्र समझते हैं ॥ ३६ ॥
ये त्वेवंगुणजातीयास्तेभ्यो दत्तं महाफलम् ।
सहस्रगुणमाप्नोति गुणार्हाय प्रदायकः ॥ ३७ ॥
जो ब्राह्मण ऊपर बताये हुए गुणोंसे युक्त होते हैं, उन्हें दिया हुआ दान महान् फल देनेवाला है। गुणवान् एवं सुयोग्य पात्रको दान देनेवाला दाता सहस्रगुना फल पाता है ॥
प्रज्ञाश्रुताभ्यां वृत्तेन शीलेन च समन्वितः ।
तारयेत कुलं सर्वमेकोऽपीह द्विजर्षभः ॥ ३८ ॥

यदि उत्तम बुद्धि, शास्त्रकी विद्वत्ता, सदाचार और सुशीलता आदि उत्तम गुणोंसे सम्पन्न एक श्रेष्ठ ब्राह्मण भी दान स्वीकार कर ले तो वह दाताके सम्पूर्ण कुलका उद्धार कर देता है ॥ ३८ ॥ गामश्वं वित्तमन्नं वा तद्विधे प्रतिपादयेत् । द्रव्याणि चान्यानि तथा प्रेत्यभावे न शोचति ॥ ३९ ॥ अतः ऐसे गुणवान् पुरुषको ही गाय, घोड़ा, अन्न, धन तथा दूसरे पदार्थ देने चाहिये। ऐसा करनेसे दाताको मरनेके बाद पश्चात्ताप नहीं करना पड़ता ॥ ३९ ॥ तारयेत कुलं सर्वमेकोऽपीह द्विजोत्तमः । किमङ्ग पुनरेवैते तस्मात् पात्रं समाचरेत् ॥ ४० ॥ (तृप्ते तृप्ताः सर्व देवाः पितरो मुनयोऽपि च ।) एक भी उत्तम ब्राह्मण श्राद्धकर्ताके समस्त कुलको तार सकता है। यदि उपर्युक्त बहुत-से ब्राह्मण तार दें इसमें तो कहना ही क्या है। अतः सुपात्रकी खोज करनी चाहिये। उससे तृप्त होनेपर सम्पूर्ण देवता, पितर और ऋषि भी तृप्त हो जाते हैं ॥ ४० ॥ निशम्य च गुणोपेतं ब्राह्मणं साधुसम्मतम् । दूरादानाय्य सत्कृत्य सर्वतश्चापि पूजयेत् ॥ ४१ ॥ सत्पुरुषोंद्वारा सम्मानित गुणवान् ब्राह्मण यदि कहीं दूर भी सुनायी पड़े तो उसको वहाँसे अपने यहाँ बुलाकर उसका हर प्रकारसे पूजन और सत्कार करना चाहिये ॥

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि बहुप्राश्निके द्वाविंशोऽध्यायः ॥ २२ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें बहुत-से प्रश्नोंका निर्णयविषयक बाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २२ ॥ (दाक्षिणात्य अधिक पाठके ४६ श्लोक मिलाकर कुल ८७ श्लोक हैं)


* श्राद्धमें भोजन करने योग्य ब्राह्मणोंके विषयमें स्मृतियोंमें इस प्रकार उल्लेख मिलता है—‘कर्मनिष्ठास्तपोनिष्ठाः पञ्चाग्निब्रह्मचारिणः । पितृमातृपराश्चैव ब्राह्मणाः श्राद्धसम्पदः ॥ तथा—‘व्रतस्थमपि दौहित्रं श्राद्धे यत्नेन भोजयेत् ।’ तात्पर्य यह है कि क्रियानिष्ठ, तपस्वी, पञ्चाग्निका सेवन करनेवाले, ब्रह्मचारी तथा पिता-माताके भक्त—ये पाँच प्रकारके ब्राह्मण श्राद्धकी सम्पत्ति हैं। इन्हें भोजन करानेसे श्राद्धकर्मका पूर्णतया सम्पादन होता है।' तथा 'अपनी कन्याका बेटा ब्रह्मचारी हो तो भी यत्नपूर्वक उसे श्राद्धमें भोजन कराना चाहिये।' ऐसा करनेसे श्राद्धकर्ता पुण्यका भागी होता है। केवल श्राद्धमें ही ऐसी छूट दी गयी है। श्राद्धके अतिरिक्त और किसी कर्ममें ब्रह्मचारीको लोभ आदि दिखाकर जो उसके व्रतको भंग करता है, उसे दोषका भागी होना पड़ता है और अपने किये हुए दानका भी पूरा-पूरा फल नहीं मिलता। इसीलिये शास्त्रमें लिखा है कि ‘मनसा पात्रमुद्दिश्य जलमध्ये जलं क्षिपेत् । दाता तत्फलमाप्नोति प्रतिग्राही न दोषभाक् ॥' अर्थात् 'यदि किसी सुपात्र (ब्रह्मचारी आदि)-को दान देना हो तो उसका मनमें ध्यान करे और उसे दान देनेके उद्देश्यसे हाथमें संकल्पका जल लेकर उसे जलहीमें छोड़ दे। इससे दाताको दानका फल मिल जाता है और दान लेनेवालेको दोषका भागी नहीं होना पड़ता।' यह बात सत्पात्रका आदर करनेके लिये बतायी गयी है। (नीलकण्ठी)

⬅ विषय-सूची (TOC)

त्रयोविंशोऽध्यायः

देवता और पितरोंके कार्यमें निमन्त्रण देने योग्य पात्रों तथा नरकगामी और स्वर्गगामी मनुष्योंके लक्षणोंका वर्णन

युधिष्ठिर उवाच

श्राद्धकाले च दैवे च पित्र्येऽपि च पितामह ।
इच्छामीह त्वयाऽऽख्यातं विहितं यत् सुरर्षिभिः ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**पितामह! देवता और ऋषियोंने श्राद्धके समय देवकार्य तथा पितृकार्यमें जिस-जिस कर्मका विधान किया है, उसका वर्णन मैं आपके मुखसे सुनना चाहता हूँ ॥ १ ॥

भीष्म उवाच

दैवं पौर्वाह्निकं कुर्यादपराह्ने तु पैतृकम् ।
मङ्गलाचारसम्पन्नः कृतशौचः प्रयत्नवान् ॥ २ ॥
मनुष्याणां तु मध्याह्ने प्रदद्यादुपपत्तिभिः ।
कालहीनं तु यद् दानं तं भागं रक्षसां विदुः ॥ ३ ॥
**भीष्मजीने कहा—**राजन्! मनुष्यको चाहिये कि वह स्नान आदिसे शुद्ध हो, मांगलिक कृत्य सम्पन्न करके प्रयत्नशील हो पूर्वाह्नमें देव-सम्बन्धी दान, अपराह्नमें पैतृक दान और मध्याह्नकालमें मनुष्य-सम्बन्धी दान आदरपूर्वक करे। असमयमें किया हुआ दान राक्षसोंका भाग माना गया है ॥ २-३ ॥

लङ्घितं चावलीढं च कलिपूर्वं च यत् कृतम् ।
रजस्वलाभिदृष्टं च तं भागं रक्षसां विदुः ॥ ४ ॥
जिस भोज्य पदार्थको किसीने लाँघ दिया हो, चाट लिया हो, जो लड़ाई-झगड़ा करके तैयार किया गया हो तथा जिसपर रजस्वला स्त्रीकी दृष्टि पड़ी हो, उसे भी राक्षसोंका ही भाग माना गया है ॥ ४ ॥

अवघुष्टं च यद् भुक्तमव्रतेन च भारत ।
परामृष्टं शुना चैव तं भागं रक्षसां विदुः ॥ ५ ॥
भरतनन्दन! जिसके लिये लोगोंमें घोषणा की गयी हो, जिसे व्रतहीन मनुष्यने भोजन किया हो अथवा जो कुत्तेसे छू गया हो, वह अन्न भी राक्षसोंका ही भाग समझा गया है ॥ ५ ॥

केशकीटावपतितं क्षुतं श्वभिरवेक्षितम् ।
रुदितं चावधूतं च तं भागं रक्षसां विदुः ॥ ६ ॥

जिसमें केश या कीड़े पड़ गये हों, जो छींकसे दूषित हो गया हो, जिसपर कुत्तोंकी दृष्टि पड़ गयी हो तथा जो रोकर और तिरस्कारपूर्वक दिया गया हो, वह अन्न भी राक्षसोंका ही भाग माना गया है ।। ६ ।। निरोङ्कारेण यद् भुक्तं सशस्त्रेण च भारत । दुरात्मना च यद् भुक्तं तं भागं रक्षसां विदुः ।। ७ ।। भरतनन्दन! जिस अन्नमेंसे पहले ऐसे व्यक्तिने खा लिया हो, जिसे खानेकी अनुमति नहीं दी गयी है अथवा जिसमेंसे पहले प्रणव आदि वेदमन्त्रोंके अनधिकारी शूद्र आदिने भोजन कर लिया हो अथवा किसी शस्त्रधारी या दुराचारी पुरुषने जिसका उपयोग कर लिया हो, उस अन्नको भी राक्षसोंका ही भाग बताया गया है ।। ७ ।। परोच्छिष्टं च यद् भुक्तं परिभुक्तं च यद् भवेत् । दैवे पित्र्ये च सततं तं भागं रक्षसां विदुः ।। ८ ।। जिसे दूसरोंने उच्छिष्ट कर दिया हो, जिसमेंसे किसीने भोजन कर लिया हो तथा जो देवता, पितर, अतिथि एवं बालक आदिको दिये बिना ही अपने उपभोगमें लाया गया हो, वह अन्न देवकर्म तथा पितृकर्ममें सदा राक्षसोंका ही भाग माना गया है ।। ८ ।। मन्त्रहीनं क्रियाहीनं यच्छाद्धं परिविष्यते । त्रिभिर्वर्णैर्नरश्रेष्ठ तं भागं रक्षसां विदुः ।। ९ ।। नरश्रेष्ठ! तीनों वर्णोंके लोग वैदिक मन्त्र एवं उसके विधि-विधानसे रहित जो श्राद्धका अन्न परोसते हैं, उसे राक्षसोंका ही भाग माना गया है ।। ९ ।। आज्याहुतिं विना चैव यत्किंचित् परिविष्यते । दुराचारैश्च यद् भुक्तं तं भागं रक्षसां विदुः ।। १० ।। ये भागा रक्षसां प्राप्तास्त उक्ता भरतर्षभ । घीकी आहुति दिये बिना ही जो कुछ परोसा जाता है तथा जिसमेंसे पहले कुछ दुराचारी मनुष्योंको भोजन करा दिया गया हो, वह राक्षसोंका भाग माना गया है। भरतश्रेष्ठ! अन्नके जो भाग राक्षसोंको प्राप्त होते हैं, उनका वर्णन यहाँ किया गया ।। १० १/२ ।। अत ऊर्ध्वं विसर्गस्य परीक्षां ब्राह्मणे शृणु ।। ११ ।। यावन्तः पतिता विप्रा जडोन्मत्तास्तथैव च । दैवे वाप्यथ पित्र्ये वा राजन् नार्हन्ति केतनम् ।। १२ ।। अब दान और भोजनके लिये ब्राह्मणकी परीक्षा करनेके विषयमें जो बात बतायी जाती है, उसे सुनो। राजन्! जो ब्राह्मण पतित, जड या उन्मत्त हो गये हों वे देवकार्य या पितृकार्यमें निमन्त्रण पानेके योग्य नहीं हैं ।। ११-१२ ।। श्वित्री क्लीबश्च कुष्ठी च तथा यक्ष्महतश्च यः । अपस्मारी च यश्चान्धो राजन् नार्हन्ति केतनम् ।। १३ ।।

राजन्! जिसके शरीरमें सफेद दाग हो, जो कोढ़ी, नपुंसक, राजयक्ष्मासे पीड़ित, मृगीका रोगी और अन्धा हो, ऐसे लोग श्राद्धमें निमन्त्रण पानेके अधिकारी नहीं हैं ।। १३ ।। चिकित्सका देवलका वृथा नियमधारिणः । सोमविक्रयिणश्चैव राजन् नार्हन्ति केतनम् ।। १४ ।। नरेश्वर! चिकित्सक या वैद्य, देवालयके पुजारी, पाखण्डी और सोमरस बेचनेवाले ब्राह्मण निमन्त्रण देने योग्य नहीं हैं ।। १४ ।। गायना नर्तकाश्चैव प्लवका वादकास्तथा । कथका योधकाश्चैव राजन् नार्हन्ति केतनम् ।। १५ ।। राजन्! जो गाते-बजाते, नाचते, खेल-कूदकर तमाशा दिखाते, व्यर्थकी बातें बनाते और पहलवानी करते हैं, वे भी निमन्त्रण पानेके अधिकारी नहीं हैं ।। होतारो वृषलानां च वृषलाध्यापकास्तथा । तथा वृषलशिष्याश्च राजन् नार्हन्ति केतनम् ।। १६ ।। नरेश्वर! जो शूद्रोंका यज्ञ कराते, उनको पढ़ाते अथवा स्वयं उनके शिष्य बनकर उनसे शिक्षा लेते या उनकी दासता करते हैं, वे भी निमन्त्रण देने योग्य नहीं हैं ।। १६ ।। अनुयोक्ता च यो विप्रो अनुयुक्तश्च भारत । नार्हतस्तावपि श्राद्धं ब्रह्मविक्रयिणौ हि तौ ।। १७ ।। भरतनन्दन! जो ब्राह्मण वेतन लेकर पढ़ाता है और वेतन देकर पढ़ता है, वे दोनों ही वेदको बेचनेवाले हैं; अतः वे श्राद्धमें सम्मिलित करनेयोग्य नहीं हैं ।। १७ ।। अग्रणीर्यः कृतः पूर्वं वर्णावरपरिग्रहः । ब्राह्मणः सर्वविद्योऽपि राजन् नार्हति केतनम् ।। १८ ।। राजन्! जो ब्राह्मण पहले समाजका अगुआ रहा हो और पीछे उसने शूद्र-स्त्रीसे विवाह कर लिया हो, वह ब्राह्मण सम्पूर्ण विद्याओंका ज्ञाता होनेपर भी श्राद्धमें बुलाने योग्य नहीं है ।। १८ ।। अनग्नयश्च ये विप्रा मृतनिर्यांतकाश्च ये । स्तेनाश्च पतिताश्चैव राजन् नार्हन्ति केतनम् ।। १९ ।। नरेश्वर! जो ब्राह्मण अग्निहोत्र नहीं करते, जो मुर्दा ढोते, चोरी करते और जो पापोंके कारण पतित हो गये हैं, वे भी श्राद्धमें बुलाने योग्य नहीं हैं ।। १९ ।। अपरिज्ञातपूर्वाश्च गणपूर्वाश्च भारत । पुत्रिकापूर्वपुत्राश्च श्राद्धे नार्हन्ति केतनम् ।। २० ।। भारत! जिनके विषयमें पहलेसे कुछ ज्ञात न हो, जो गाँवके अगुआ हों तथा पुत्रिका*-धर्मके अनुसार व्याही गयी स्त्रीके गर्भसे उत्पन्न होकर नानाके घरमें निवास करते हों, ऐसे ब्राह्मण भी श्राद्धमें निमन्त्रण पानेके अधिकारी नहीं हैं ।। २० ।। ऋणकर्ता च यो राजन् यश्च वार्धुषिको नरः ।

प्राणिविक्रयवृत्तिश्च राजन् नार्हन्ति केतनम् ॥ २१ ॥ राजन्! जो ब्राह्मण रुपया-पैसा बढ़ानेके लिये लोगोंको ब्याजपर ऋण देता हो अथवा जो सस्ता अन्न खरीदकर उसे मँहगे भावपर बेचता और उसका मुनाफा खाता हो अथवा प्राणियोंके क्रय-विक्रयसे जीविका चलाता हो, ऐसे ब्राह्मण श्राद्धमें बुलाने योग्य नहीं हैं ॥

स्त्रीपूर्वाः काण्डपृष्ठाश्च यावन्तो भरतर्षभ ।
अजपा ब्राह्मणाश्चैव श्राद्धे नार्हन्ति केतनम् ॥ २२ ॥
जो स्त्रीकी कमाई खाते हों, वेश्याके पति हों और गायत्री-जप एवं संध्या-वन्दनसे हीन हों, ऐसे ब्राह्मण भी श्राद्धमें सम्मिलित होने योग्य नहीं हैं ॥ २२ ॥

श्राद्धे दैवे च निर्दिष्टो ब्राह्मणो भरतर्षभ ।
दातुः प्रतिग्रहीतुश्च शृणुष्वानुग्रहं पुनः ॥ २३ ॥
भरतश्रेष्ठ! देवयज्ञ और श्राद्धकर्ममें वर्जित ब्राह्मणका निर्देश किया गया। अब दान देने और लेनेवाले ऐसे पुरुषोंका वर्णन करता हूँ जो श्राद्धमें निषिद्ध होनेपर भी किसी विशेष गुणके कारण अनुग्रहपूर्वक ग्राह्य माने गये हैं। उनके विषयमें सुनो ॥ २३ ॥

चीर्णव्रता गुणैर्युक्ता भवेयुर्येऽपि कर्षकाः ।
सावित्रीज्ञाः क्रियावन्तस्ते राजन् केतनक्षमाः ॥ २४ ॥
राजन्! जो ब्राह्मण व्रतका पालन करनेवाले, सद्गुण-सम्पन्न, क्रियानिष्ठ और गायत्रीमन्त्रके ज्ञाता हों, वे खेती करनेवाले होनेपर भी उन्हें श्राद्धमें निमन्त्रण दिया जा सकता है ॥ २४ ॥

क्षात्रधर्मिणमप्याजौ केतयेत् कुलजं द्विजम् ।
न त्वेव वणिजं तात श्राद्धे च परिकल्पयेत् ॥ २५ ॥
तात! जो कुलीन ब्राह्मण युद्धमें क्षत्रियधर्मका पालन करता हो, उसे भी श्राद्धमें निमन्त्रित करना चाहिये; परंतु जो वाणिज्य करता हो उसे कभी श्राद्धमें सम्मिलित न करें ॥ २५ ॥

अग्निहोत्री च यो विप्रो ग्रामवासी च यो भवेत् ।
अस्तेनश्चातिथिज्ञश्च स राजन् केतनक्षमः ॥ २६ ॥
राजन्! जो ब्राह्मण अग्निहोत्री हो, अपने ही गाँवका निवासी हो, चोरी न करता हो और अतिथिसत्कारमें प्रवीण हो, उसे भी निमन्त्रण दिया जा सकता है ॥ २६ ॥

सावित्रीं जपते यस्तु त्रिकालं भरतर्षभ ।
भिक्षावृत्तिः क्रियावांश्च स राजन् केतनक्षमः ॥ २७ ॥
भरतभूषण नरेश! जो तीनों समय गायत्री-मन्त्रका जप करता है, भिक्षासे जीविका चलाता है और क्रियानिष्ठ है, वह श्राद्धमें निमन्त्रण पानेका अधिकारी है ॥ २७ ॥

उदितास्तमितो यश्च तथैवास्तमितोदितः ।
अहिंस्रश्चाल्पदोषश्च स राजन् केतनक्षमः ॥ २८ ॥

राजन्! जो ब्राह्मण उन्नत होकर तत्काल ही अवनत और अवनत होकर उन्नत हो जाता है एवं किसी जीवकी हिंसा नहीं करता है, वह थोड़ा दोषी हो तो भी उसे श्राद्धमें निमन्त्रण देना उचित है ॥ २८ ॥

अकल्कको ह्यतर्कश्च ब्राह्मणो भरतर्षभ ।
संसर्गे भैक्ष्यवृत्तिश्च स राजन् केतनक्षमः ॥ २९ ॥
भरतश्रेष्ठ! जो दम्भरहित, व्यर्थ तर्क-वितर्क न करनेवाला तथा सम्पर्क स्थापित करनेके योग्य घरसे भिक्षा लेकर जीवन-निर्वाह करनेवाला है, वह ब्राह्मण निमन्त्रण पानेका अधिकारी है ॥ २९ ॥

अव्रती कितवः स्तेनः प्राणिविक्रयिको वणिक् ।
पश्चाच्च पीतवान् सोमं स राजन् केतनक्षमः ॥ ३० ॥
राजन्! जो व्रतहीन, धूर्त, चोर, प्राणियोंका क्रय-विक्रय करनेवाला तथा वणिक्-वृत्तिसे जीविका चलानेवाला होकर भी पीछे यज्ञका अनुष्ठान करके उसमें सोमरसका पान कर चुका है, वह भी निमन्त्रण पानेका अधिकारी है ॥ ३० ॥

अर्जयित्वा धनं पूर्वं दारुणैरपि कर्मभिः ।
भवेत् सर्वातिथिः पश्चात् स राजन् केतनक्षमः ॥ ३१ ॥
नरेश्वर! जो पहले कठोर कर्मोंद्वारा भी धनका उपार्जन करके पीछे सब प्रकारसे अतिथियोंका सेवक हो जाता है, वह श्राद्धमें बुलाने योग्य है ॥ ३१ ॥

ब्रह्मविक्रयनिर्दिष्टं स्त्रिया यच्चार्जितं धनम् ।
अदेयं पितृविप्रेभ्यो यच्च क्लैब्यादुपार्जितम् ॥ ३२ ॥
जो धन वेद बेचकर लाया गया हो या स्त्रीकी कमाईसे प्राप्त हुआ हो अथवा लोगोंके सामने दीनता दिखाकर माँग लाया गया हो, वह श्राद्धमें ब्राह्मणोंको देने योग्य नहीं है ॥ ३२ ॥

क्रियमाणेऽपवर्गे च यो द्विजो भरतर्षभ ।
न व्याहरति यद्युक्तं तस्याधर्मो गवानृतम् ॥ ३३ ॥
भरतश्रेष्ठ! जो ब्राह्मण श्राद्धकी समाप्ति होनेपर ‘अस्तु स्वधा’ आदि तत्कालोचित वचनोंका प्रयोग नहीं करता है, उसे गायकी झूठी शपथ खानेका पाप लगता है ॥

श्राद्धस्य ब्राह्मणः कालः प्राप्तं दधि घृतं तथा ।
सोमक्षयश्च मांसं च यदारण्यं युधिष्ठिर ॥ ३४ ॥
युधिष्ठिर! जिस दिन भी सुपात्र ब्राह्मण, दही, घी, अमावास्या तिथि तथा जंगली कन्द, मूल और फलोंका गूदा प्राप्त हो जाय, वही श्राद्धका उत्तम काल है ॥ ३४ ॥

(मुहूर्तानां त्रयं पूर्वमह्नः प्रातरिति स्मृतम् ।
जपध्यानादिभिस्तस्मिन् विप्रैः कार्यं शुभव्रतम् ॥

दिनका प्रथम तीन मुहूर्त प्रातःकाल कहलाता है। उसमें ब्राह्मणोंको जप और ध्यान आदिके द्वारा अपने लिये कल्याणकारी व्रत आदिका पालन करना चाहिये ॥
सङ्गवाख्यं त्रिभागं तु मध्याह्नस्त्रिमुहूर्तकः ।
लौकिकं सङ्गवेऽर्थ्यं च स्नानादि ह्यथ मध्यमे ॥
उसके बादका तीन मुहूर्त सङ्गव कहलाता है तथा सङ्गवके बादका तीन मुहूर्त मध्याह्न कहलाता है। सङ्गव कालमें लौकिक कार्य देखना चाहिये और मध्याह्नकालमें स्नान-संध्यावन्दन आदि करना उचित है ॥
चतुर्थमपराह्नं तु त्रिमुहूर्तं तु पित्र्यकम् ।
सायाह्नस्त्रिमुहूर्तं च मध्यमं कविभिः स्मृतम् ॥)
मध्याह्नके बादका तीन मुहूर्त अपराह्न कहलाता है। यह दिनका चौथा भाग पितृकार्यके लिये उपयोगी है। उसके बादका तीन मुहूर्त सायाह्न कहा गया है। इसे विद्वानोंने दिन और रातके बीचका समय माना है ॥
श्राद्धापवर्गे विप्रस्य स्वधा वै मुदिता भवेत् ।
क्षत्रियस्यापि यो ब्रूयात् प्रीयन्तां पितरस्त्विति ॥ ३५ ॥
ब्राह्मणके यहाँ श्राद्ध समाप्त होनेपर ‘स्वधा सम्पद्यताम्’ इस वाक्यका उच्चारण करनेपर पितरोंको प्रसन्नता होती है। क्षत्रियके यहाँ श्राद्धकी समाप्तिमें ‘पितरः प्रीयन्ताम्’ (पितर तृप्त हो जायँ) इस वाक्यका उच्चारण करना चाहिये ॥ ३५ ॥
अपवर्गे तु वैश्यस्य श्राद्धकर्मणि भारत ।
अक्षय्यमभिधातव्यं स्वस्ति शूद्रस्य भारत ॥ ३६ ॥
भारत! वैश्यके घर श्राद्धकर्मकी समाप्तिपर ‘अक्षय्यमस्तु’ (श्राद्धका दान अक्षय हो) कहना चाहिये और शूद्रके श्राद्धकी समाप्तिके अवसरपर ‘स्वस्ति’ (कल्याण हो) इस वाक्यका उच्चारण करना उचित है ॥ ३६ ॥
पुण्याहवाचनं दैवं ब्राह्मणस्य विधीयते ।
एतदेव निरोङ्कारं क्षत्रियस्य विधीयते ॥ ३७ ॥
इसी तरह जब ब्राह्मणके यहाँ देवकार्य होता हो, तब उसमें ॐकारसहित पुण्याहवाचनका विधान है (अर्थात् ‘पुण्याहं भवन्तो ब्रुवन्तु—आपलोग पुण्याहवाचन करें’ ऐसा यजमानके कहनेपर ब्राह्मणोंको ‘ॐ पुण्याहम् ॐ पुण्याहम्’ इस प्रकार कहना चाहिये)। यही वाक्य क्षत्रियके यहाँ बिना ॐकारके उच्चारण करना चाहिये ॥
वैश्यस्य दैवे वक्तव्यं प्रीयन्तां देवता इति ।
कर्मणामानुपूव्येण विधिपूर्वं कृतं शृणु ॥ ३८ ॥
वैश्यके घर देवकर्ममें ‘प्रीयन्तां देवता:’ इस वाक्यका उच्चारण करना चाहिये। अब क्रमशः तीनों वर्णोंके कर्मानुष्ठानकी विधि सुनो ॥ ३८ ॥
जातकर्मादिकाः सर्वास्त्रिषु वर्णेषु भारत ।