भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 329, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 329

राजन्! जिसके शरीरमें सफेद दाग हो, जो कोढ़ी, नपुंसक, राजयक्ष्मासे पीड़ित, मृगीका रोगी और अन्धा हो, ऐसे लोग श्राद्धमें निमन्त्रण पानेके अधिकारी नहीं हैं ।। १३ ।। चिकित्सका देवलका वृथा नियमधारिणः । सोमविक्रयिणश्चैव राजन् नार्हन्ति केतनम् ।। १४ ।। नरेश्वर! चिकित्सक या वैद्य, देवालयके पुजारी, पाखण्डी और सोमरस बेचनेवाले ब्राह्मण निमन्त्रण देने योग्य नहीं हैं ।। १४ ।। गायना नर्तकाश्चैव प्लवका वादकास्तथा । कथका योधकाश्चैव राजन् नार्हन्ति केतनम् ।। १५ ।। राजन्! जो गाते-बजाते, नाचते, खेल-कूदकर तमाशा दिखाते, व्यर्थकी बातें बनाते और पहलवानी करते हैं, वे भी निमन्त्रण पानेके अधिकारी नहीं हैं ।। होतारो वृषलानां च वृषलाध्यापकास्तथा । तथा वृषलशिष्याश्च राजन् नार्हन्ति केतनम् ।। १६ ।। नरेश्वर! जो शूद्रोंका यज्ञ कराते, उनको पढ़ाते अथवा स्वयं उनके शिष्य बनकर उनसे शिक्षा लेते या उनकी दासता करते हैं, वे भी निमन्त्रण देने योग्य नहीं हैं ।। १६ ।। अनुयोक्ता च यो विप्रो अनुयुक्तश्च भारत । नार्हतस्तावपि श्राद्धं ब्रह्मविक्रयिणौ हि तौ ।। १७ ।। भरतनन्दन! जो ब्राह्मण वेतन लेकर पढ़ाता है और वेतन देकर पढ़ता है, वे दोनों ही वेदको बेचनेवाले हैं; अतः वे श्राद्धमें सम्मिलित करनेयोग्य नहीं हैं ।। १७ ।। अग्रणीर्यः कृतः पूर्वं वर्णावरपरिग्रहः । ब्राह्मणः सर्वविद्योऽपि राजन् नार्हति केतनम् ।। १८ ।। राजन्! जो ब्राह्मण पहले समाजका अगुआ रहा हो और पीछे उसने शूद्र-स्त्रीसे विवाह कर लिया हो, वह ब्राह्मण सम्पूर्ण विद्याओंका ज्ञाता होनेपर भी श्राद्धमें बुलाने योग्य नहीं है ।। १८ ।। अनग्नयश्च ये विप्रा मृतनिर्यांतकाश्च ये । स्तेनाश्च पतिताश्चैव राजन् नार्हन्ति केतनम् ।। १९ ।। नरेश्वर! जो ब्राह्मण अग्निहोत्र नहीं करते, जो मुर्दा ढोते, चोरी करते और जो पापोंके कारण पतित हो गये हैं, वे भी श्राद्धमें बुलाने योग्य नहीं हैं ।। १९ ।। अपरिज्ञातपूर्वाश्च गणपूर्वाश्च भारत । पुत्रिकापूर्वपुत्राश्च श्राद्धे नार्हन्ति केतनम् ।। २० ।। भारत! जिनके विषयमें पहलेसे कुछ ज्ञात न हो, जो गाँवके अगुआ हों तथा पुत्रिका*-धर्मके अनुसार व्याही गयी स्त्रीके गर्भसे उत्पन्न होकर नानाके घरमें निवास करते हों, ऐसे ब्राह्मण भी श्राद्धमें निमन्त्रण पानेके अधिकारी नहीं हैं ।। २० ।। ऋणकर्ता च यो राजन् यश्च वार्धुषिको नरः ।