महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजिसमें केश या कीड़े पड़ गये हों, जो छींकसे दूषित हो गया हो, जिसपर कुत्तोंकी दृष्टि पड़ गयी हो तथा जो रोकर और तिरस्कारपूर्वक दिया गया हो, वह अन्न भी राक्षसोंका ही भाग माना गया है ।। ६ ।। निरोङ्कारेण यद् भुक्तं सशस्त्रेण च भारत । दुरात्मना च यद् भुक्तं तं भागं रक्षसां विदुः ।। ७ ।। भरतनन्दन! जिस अन्नमेंसे पहले ऐसे व्यक्तिने खा लिया हो, जिसे खानेकी अनुमति नहीं दी गयी है अथवा जिसमेंसे पहले प्रणव आदि वेदमन्त्रोंके अनधिकारी शूद्र आदिने भोजन कर लिया हो अथवा किसी शस्त्रधारी या दुराचारी पुरुषने जिसका उपयोग कर लिया हो, उस अन्नको भी राक्षसोंका ही भाग बताया गया है ।। ७ ।। परोच्छिष्टं च यद् भुक्तं परिभुक्तं च यद् भवेत् । दैवे पित्र्ये च सततं तं भागं रक्षसां विदुः ।। ८ ।। जिसे दूसरोंने उच्छिष्ट कर दिया हो, जिसमेंसे किसीने भोजन कर लिया हो तथा जो देवता, पितर, अतिथि एवं बालक आदिको दिये बिना ही अपने उपभोगमें लाया गया हो, वह अन्न देवकर्म तथा पितृकर्ममें सदा राक्षसोंका ही भाग माना गया है ।। ८ ।। मन्त्रहीनं क्रियाहीनं यच्छाद्धं परिविष्यते । त्रिभिर्वर्णैर्नरश्रेष्ठ तं भागं रक्षसां विदुः ।। ९ ।। नरश्रेष्ठ! तीनों वर्णोंके लोग वैदिक मन्त्र एवं उसके विधि-विधानसे रहित जो श्राद्धका अन्न परोसते हैं, उसे राक्षसोंका ही भाग माना गया है ।। ९ ।। आज्याहुतिं विना चैव यत्किंचित् परिविष्यते । दुराचारैश्च यद् भुक्तं तं भागं रक्षसां विदुः ।। १० ।। ये भागा रक्षसां प्राप्तास्त उक्ता भरतर्षभ । घीकी आहुति दिये बिना ही जो कुछ परोसा जाता है तथा जिसमेंसे पहले कुछ दुराचारी मनुष्योंको भोजन करा दिया गया हो, वह राक्षसोंका भाग माना गया है। भरतश्रेष्ठ! अन्नके जो भाग राक्षसोंको प्राप्त होते हैं, उनका वर्णन यहाँ किया गया ।। १० १/२ ।। अत ऊर्ध्वं विसर्गस्य परीक्षां ब्राह्मणे शृणु ।। ११ ।। यावन्तः पतिता विप्रा जडोन्मत्तास्तथैव च । दैवे वाप्यथ पित्र्ये वा राजन् नार्हन्ति केतनम् ।। १२ ।। अब दान और भोजनके लिये ब्राह्मणकी परीक्षा करनेके विषयमें जो बात बतायी जाती है, उसे सुनो। राजन्! जो ब्राह्मण पतित, जड या उन्मत्त हो गये हों वे देवकार्य या पितृकार्यमें निमन्त्रण पानेके योग्य नहीं हैं ।। ११-१२ ।। श्वित्री क्लीबश्च कुष्ठी च तथा यक्ष्महतश्च यः । अपस्मारी च यश्चान्धो राजन् नार्हन्ति केतनम् ।। १३ ।।