महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 35, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंकाल ही इनका संहार कर देता है ॥
एवं ज्ञात्वा कथं मां त्वं सदोषं सर्प मन्यसे ।
अथ चैवंगते दोषे मयि त्वमपि दोषवान् ॥ ५७ ॥
सर्प! यह सब जानकर भी तुम मुझे कैसे दोषी मानते हो? और यदि ऐसी स्थितिमें भी मुझपर दोषारोपण हो सकता है, तब तो तू भी दोषी ही है ॥
सर्प उवाच
निर्दोषं दोषवन्तं वा न त्वां मृत्यो ब्रवीम्यहम् ।
त्वयाहं चोदित इति ब्रवीम्येतावदेव तु ॥ ५८ ॥
**सर्पने कहा—**मृत्यो! मैं तुम्हें न तो निर्दोष बताता हूँ और न दोषी ही। मैं तो इतना ही कह रहा हूँ कि इस बालकको डँसनेके लिये तूने ही मुझे प्रेरित किया था ॥ ५८ ॥
यदि काले तु दोषोऽस्ति यदि तत्रापि नेष्यते ।
दोषो नैव परीक्ष्यो मे न ह्यत्राधिकृता वयम् ॥ ५९ ॥
इस विषयमें यदि कालका दोष है अथवा यदि वह भी निर्दोष है तो हो, मुझे किसीके दोषकी जाँच नहीं करनी है और जाँच करनेका मुझे कोई अधिकार भी नहीं है ॥ ५९ ॥
निर्मोक्षस्त्वस्य दोषस्य मया कार्यो यथा तथा ।
मृत्योरपि न दोषः स्यादिति मेऽत्र प्रयोजनम् ॥ ६० ॥
परंतु मेरे ऊपर जो दोष लगाया गया है, उसका निवारण तो मुझे जैसे-तैसे करना ही है। मेरे कहनेका यह प्रयोजन नहीं है कि मृत्युका भी दोष सिद्ध हो जाय ॥ ६० ॥
भीष्म उवाच
सर्पोऽथार्जुनकं प्राह श्रुतं ते मृत्युभाषितम् ।
नानागसं मां पाशेन संतापयितुमर्हसि ॥ ६१ ॥
**भीष्मजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! तदनन्तर सर्पने अर्जुनकसे कहा—'तुमने मृत्युकी बात तो सुन ली न? अब मुझ निरपराधको बन्धनमें बाँधकर कष्ट देना तुम्हारे लिये उचित नहीं है ॥ ६१ ॥
लुब्धक उवाच
मृत्योः श्रुतं मे वचनं तव चैव भुजङ्गम ।
नैव तावददोषत्वं भवति त्वयि पन्नग ॥ ६२ ॥
**व्याधने कहा—**पन्नग! मैंने मृत्युकी और तेरी—दोनोंकी बातें सुन लीं; किंतु भुजंगम! इससे तेरी निर्दोषता नहीं सिद्ध हो रही है ॥ ६२ ॥
मृत्युस्त्वं चैव हेतुर्हि बालस्यास्य विनाशने ।
उभयं कारणं मन्ये न कारणमकारणम् ॥ ६३ ॥