महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 378, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंअष्टाविंशोऽध्यायः
ब्राह्मणत्व प्राप्त करनेका आग्रह छोड़कर दूसरा वर माँगनेके लिये इन्द्रका मतङ्गको समझाना
भीष्म उवाच
एवमुक्तो मतङ्गस्तु संशितात्मा यतव्रतः ।
अतिष्ठदेकपादेन वर्षाणां शतमच्युतः ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं—राजन्! इन्द्रके ऐसा कहनेपर मतंगका मन और भी दृढ़ हो गया। वह संयमपूर्वक उत्तम व्रतका पालन करने लगा। अपने धैर्यसे च्युत न होनेवाला मतंग सौ वर्षोंतक एक पैरसे खड़ा रहा ॥ १ ॥
तमुवाच ततः शक्रः पुनरेव महायशाः ।
ब्राह्मण्यं दुर्लभं तात प्रार्थयानो न लप्स्यसे ॥ २ ॥
तब महायशस्वी इन्द्रने पुनः आकर उससे कहा—'तात! ब्राह्मणत्व दुर्लभ है। उसे माँगनेपर भी पा न सकोगे ॥ २ ॥
मतङ्ग परमं स्थानं प्रार्थयन् विनशिष्यसि ।
मा कृथाः साहसं पुत्र नैष धर्मपथस्तव ॥ ३ ॥
मतंग! तुम इस उत्तम स्थानको माँगते-माँगते मर जाओगे। बेटा! दुःसाहस न करो। तुम्हारे लिये यह धर्मका मार्ग नहीं है ॥ ३ ॥
न हि शक्यं त्वया प्राप्तुं ब्राह्मण्यमिह दुर्मते ।
अप्राप्यं प्रार्थयानो हि नचिराद् विनशिष्यसि ॥ ४ ॥
'दुर्मते! तुम इस जीवनमें ब्राह्मणत्व नहीं पा सकते। उस अप्राप्य वस्तुके लिये प्रार्थना करते-करते शीघ्र ही कालके गालमें चले जाओगे ॥ ४ ॥
मतङ्ग परमं स्थानं वार्यमाणोऽसकृन्मया ।
चिकीर्षस्येव तपसा सर्वथा न भविष्यसि ॥ ५ ॥
'मतंग! मैं तुम्हें बार-बार मना करता हूँ तो भी उस उत्कृष्ट स्थानको तुम तपस्याद्वारा प्राप्त करनेकी अभिलाषा करते ही जाते हो। ऐसा करनेसे सर्वथा तुम्हारी सत्ता मिट जायगी ॥ ५ ॥
तिर्यग्योनिगतः सर्वो मानुष्यं यदि गच्छति ।
स जायते पुल्कसो वा चण्डालो वाप्यसंशयः ॥ ६ ॥
'पशु-पक्षीकी योनिमें पड़े हुए सभी प्राणी यदि कभी मनुष्ययोनिमें जाते हैं तो पहले पुल्कस या चाण्डालके रूपमें जन्म लेते हैं—इसमें संशय नहीं है ॥ ६ ॥