भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 461, कुल 2566 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 461

⬅ विषय-सूची (TOC)

त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः

देवशर्माका विपुलको निर्दोष बताकर समझाना और भीष्मका युधिष्ठिरको स्त्रियोंकी रक्षाके लिये आदेश देना

भीष्म उवाच

तमागतमभिप्रेक्ष्य शिष्यं वाक्यमथाब्रवीत् ।
देवशर्मा महातेजा यत् तत् शृणु जनाधिप ॥ १ ॥
**भीष्मजी कहते हैं—**नरेश्वर! अपने शिष्य विपुलको आया हुआ देख महातेजस्वी देवशर्माने उनसे जो बात कही, वही बताता हूँ, सुनो ॥ १ ॥

देवशर्मोवाच

किं ते विपुल दृष्टं वै तस्मिन् शिष्य महावने ।
ते त्वां जानन्ति विपुल आत्मा च रुचिरेव च ॥ २ ॥
**देवशर्माने पूछा—**मेरे प्रिय शिष्य विपुल! तुमने उस महान् वनमें क्या देखा था? वे लोग तो तुम्हें जानते हैं। उन्हें तुम्हारी अन्तरात्माका तथा मेरी पत्नी रुचिका भी पूरा परिचय प्राप्त है ॥ २ ॥

विपुल उवाच

ब्रह्मर्षे मिथुनं किं तत् के च ते पुरुषा विभो ।
ये मां जानन्ति तत्त्वेन यन्मां त्वं परिपृच्छसि ॥ ३ ॥
**विपुलने कहा—**ब्रह्मर्षे! मैंने जिसे देखा था, वह स्त्री-पुरुषका जोड़ा कौन था? तथा वे छः पुरुष भी कौन थे जो मुझे अच्छी तरह जानते थे और जिनके विषयमें आप भी मुझसे पूछ रहे हैं? ॥ ३ ॥

देवशर्मोवाच

यद् वै तन्मिथुनं ब्रह्मन्नहोरात्रं हि विद्धि तत् ।
चक्रवत् परिवर्तैत तत् ते जानाति दुष्कृतम् ॥ ४ ॥
ये च ते पुरुषा विप्र अक्षैर्दीव्यन्ति हृष्टवत् ।
ऋतूंस्तानभिजानीहि ते ते जानन्ति दुष्कृतम् ॥ ५ ॥
**देवशर्माने कहा—**ब्रह्मन्! तुमने जो स्त्री-पुरुषका जोड़ा देखा था उसे दिन और रात्रि समझो। वे दोनों चक्रवत् घूमते रहते हैं, अतः उन्हें तुम्हारे पापका पता है। विप्रवर! तथा जो अत्यन्त हर्षमें भरकर जूआ खेलते हुए छः पुरुष दिखायी दिये उन्हें छः ऋतु जानो; वे भी तुम्हारे पापको जानते हैं ॥ ४-५ ॥

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व · पृष्ठ 461, कुल 2566 में से · BharatKosha