महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 460, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंतस्य चिन्तयतस्तात वह्व्यो दिननिशा ययुः ।
इदमासीन्मनसि स रुच्या रक्षणकारितम् ।। ३० ।।
तात! इस प्रकार चिन्ता करते हुए उनके कई दिन और कई रातें बीत गयीं। तब गुरुपत्नी रुचिकी रक्षाके कारण उनके मनमें ऐसा विचार उठा— ।। ३० ।।
लक्षणं लक्षणेनैव वदनं वदनेन च ।
विधाय न मया चोक्तं सत्यमेतद् गुरोस्तथा ।। ३१ ।।
‘मैंने जब गुरुपत्नीकी रक्षाके लिये उनके शरीरमें सूक्ष्मरूपसे प्रवेश किया था तब मेरी लक्षणेन्द्रिय उनकी लक्षणेन्द्रियसे और मुख उनके मुखसे संयुक्त हुआ था। ऐसा अनुचित कार्य करके भी मैंने गुरुजीको यह सच्ची बात नहीं बतायी’ ।। ३१ ।।
एतदात्मनि कौरव्य दुष्कृतं विपुलस्तदा ।
अमन्यत महाभाग तथा तच्च न संशयः ।। ३२ ।।
महाभाग कुरुनन्दन! उस समय विपुलने अपने मनमें इसीको पाप माना और निस्संदेह बात भी ऐसी ही थी ।। ३२ ।।
स चम्पां नगरीमेत्य पुष्पाणि गुरवे ददौ ।
पूजयामास च गुरुं विधिवत् स गुरुप्रियः ।। ३३ ।।
चम्पानगरीमें जाकर गुरुप्रेमी विपुलने वे फूल गुरुजीको अर्पित कर दिये और उनका विधिपूर्वक पूजन किया ।। ३३ ।।
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि विपुलोपाख्याने
द्विचत्वारिंशोऽध्यायः ।। ४२ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें विपुलका
उपाख्यानविषयक बयालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ४२ ।।