महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलोभमास्थाय योऽस्माकं विषमं कर्तुमुत्सहेत् । विपुलस्य परे लोके या गतिस्तामवाप्नुयात् ।। २७ ।। ‘हमलोगोंमेंसे जो लोभका आश्रय लेकर बेईमानी करनेका साहस करेगा, उसको वही गति मिलेगी, जो परलोकमें विपुलको मिलनेवाली है— ।। २७ ।।
एतत् श्रुत्वा तु विपुलो नापश्यद् धर्मसंकरम् । जन्मप्रभृति कौरव्य कृतपूर्वमथात्मनः ।। २८ ।। कुरुनन्दन! यह सुनकर विपुलने जन्मसे लेकर वर्तमान समयतकके अपने समस्त कर्मोंका स्मरण किया; किंतु कभी कोई धर्मके साथ पापका मिश्रण हुआ हो, ऐसा नहीं दिखायी दिया ।। २८ ।।
सम्प्रदध्यौ तथा राजन्नग्नावग्निरिवाहितः । दह्यमानेन मनसा शापं श्रुत्वा तथाविधम् ।। २९ ।। राजन्! परंतु अपने विषयमें वैसा शाप सुनकर जैसे एक आगमें दूसरी आग रख दी गयी हो और उसकी ज्वाला और भी बढ़ गयी हो, उसी प्रकार विपुलका हृदय शोकाग्निसे दग्ध होने लगा और उसी अवस्थामें वे पुनःअपने कार्योंपर विचार करने लगे ।। २९ ।।