भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 552, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 552

भीष्म उवाच

कुशिकस्तु मुनेर्वाक्यं च्यवनस्य महात्मनः ॥ १५ ॥ श्रुत्वा हृष्टोऽभवद् राजा वाक्यं चेदमुवाच ह । एवमस्त्विति धर्मात्मा तदा भरतसत्तम ॥ १६ ॥ भीष्मजी कहते हैं—भरतश्रेष्ठ! महात्मा च्यवन मुनिका यह वचन सुनकर धर्मात्मा राजा कुशिक बड़े प्रसन्न हुए और बोले, 'भगवन्! ऐसा ही हो' ॥

च्यवनस्तु महातेजाः पुनरेव नराधिपम् । वरार्थं चोदयामास तमुवाच स पार्थिवः ॥ १७ ॥ महातेजस्वी च्यवनने पुनः राजा कुशिकको वर माँगनेके लिये प्रेरित किया। तब वे भूपाल इस प्रकार बोले— ॥ १७ ॥

बाढमेवं करिष्यामि कामं त्वत्तो महामुने । ब्रह्मभूतं कुलं मेऽस्तु धर्मे चास्य मनो भवेत् ॥ १८ ॥ 'महामुने! बहुत अच्छा, मैं आपसे अपना मनोरथ प्रकट करूँगा। मुझे यही वर दीजिये कि मेरा कुल ब्राह्मण हो जाय और उसका धर्ममें मन लगा रहे' ॥ १८ ॥

एवमुक्तस्तथेत्येवं प्रत्युक्त्वा च्यवनो मुनिः । अभ्यनुज्ञाय नृपतिं तीर्थयात्रां ययौ तदा ॥ १९ ॥ कुशिकके ऐसा कहनेपर च्यवन मुनि बोले 'तथास्तु'। फिर वे राजासे विदा ले वहाँसे तत्काल तीर्थयात्राके लिये चले गये ॥ १९ ॥

एतत् ते कथितं सर्वमशेषेण मया नृप । भृगूणां कुशिकानां च अभिसम्बन्धकारणम् ॥ २० ॥ नरेश्वर! इस प्रकार मैंने तुमसे भृगुवंशी और कुशिकवंशियोंके परस्पर सम्बन्धका सब कारण पूर्णरूपसे बताया है ॥ २० ॥

यथोक्तमृषिणा चापि तदा तदभवन्नृप । जन्म रामस्य च मुनेर्विश्वामित्रस्य चैव हि ॥ २१ ॥ युधिष्ठिर! उस समय च्यवन ऋषिने जैसा कहा था, उसके अनुसार ही आगे चलकर भृगुकुलमें परशुरामका और कुशिकवंशमें विश्वामित्रका जन्म हुआ ॥ २१ ॥

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि च्यवनकुशिकसंवादे षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५६ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें च्यवन और कुशिकका संवादविषयक छप्पनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५६ ॥