भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 563, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 563

है ॥ १४ ॥ निदाघकाले पानीयं तडागे यस्य तिष्ठति । वाजिमेधफलं तस्य फलं वै मुनयो विदुः ॥ १५ ॥ जिसके तालाबमें ग्रीष्म ऋतुतक पानी रुका रहता है, उसे अश्वमेध यज्ञका फल प्राप्त होता है—ऐसा मुनियोंका मत है ॥ १५ ॥ स कुलं तारयेत् सर्वं यस्य खाते जलाशये । गावः पिबन्ति सलिलं साधवश्च नराः सदा ॥ १६ ॥ जिसके खोदवाये हुए जलाशयमें सदा साधु पुरुष और गौएँ पानी पीती हैं, वह अपने समस्त कुलका उद्धार कर देता है ॥ १६ ॥ तडागे यस्य गावस्तु पिबन्ति तृषिता जलम् । मृगपक्षिमुष्याश्च सोऽश्वमेधफलं लभेत् ॥ १७ ॥ जिसके तालाबमें प्यासी गौएँ पानी पीती हैं तथा मृग, पक्षी और मनुष्योंको भी जल सुलभ होता है, वह अश्वमेध यज्ञका फल पाता है ॥ १७ ॥ यत् पिबन्ति जलं तत्र स्नायन्ते विश्रमन्ति च । तडागे यस्य तत् सर्वं प्रेत्यानन्त्याय कल्पते ॥ १८ ॥ यदि किसीके तालाबमें लोग स्नान करते, पानी पीते और विश्राम करते हैं तो इन सबका पुण्य उस पुरुषको मरनेके बाद अक्षय सुख प्रदान करता है ॥ १८ ॥ दुर्लभं सलिलं तात विशेषेण परत्र वै । पानीयस्य प्रदानेन प्रीतिर्भवति शाश्वती ॥ १९ ॥ तात! जल दुर्लभ पदार्थ है। परलोकमें तो उसका मिलना और भी कठिन है। जो जलका दान करते हैं, वे ही वहाँ जलदानके पुण्यसे सदा तृप्त रहते हैं ॥ १९ ॥ तिलान् ददत पानीयं दीपान् ददत जाग्रत । ज्ञातिभिः सह मोदध्वमेतत् प्रेत्य सुदुर्लभम् ॥ २० ॥ बन्धुओ! तिलका दान करो, जल-दान करो, दीप-दान करो, सदा धर्म करनेके लिये सजग रहो तथा कुटुम्बीजनोंके साथ सर्वदा धर्मपालनपूर्वक रहकर आनन्दका अनुभव करो। मृत्युके बाद इन सत्कर्मोंसे परलोकमें अत्यन्त दुर्लभ फलकी प्राप्ति होती है ॥ सर्वदानैर्गुरुतरं सर्वदानैर्विशिष्यते । पानीयं नरशार्दूल तस्माद् दातव्यमेव हि ॥ २१ ॥ पुरुषसिंह! जलदान सब दानोंसे महान् और समस्त दानोंसे बढ़कर है; अतः उसका दान अवश्य करना चाहिये ॥ २१ ॥ एवमेतत् तडागस्य कीर्तितं फलमुत्तमम् । अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि वृक्षाणामवरोपणम् ॥ २२ ॥