महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 576, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंएकषष्टितमोऽध्यायः
राजाके लिये यज्ञ, दान और ब्राह्मण आदि प्रजाकी रक्षाका उपदेश
युधिष्ठिर उवाच
दानं यज्ञः क्रिया चेह किंस्वित् प्रेत्य महाफलम् ।
कस्य ज्यायः फलं प्रोक्तं कीदृशेभ्यः कथं कदा ॥ १ ॥
एतदिच्छामि विज्ञातुं याथातथ्येन भारत ।
विद्वन् जिज्ञासमानाय दानधर्मान् प्रचक्ष्व मे ॥ २ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**भारत! दान और यज्ञकर्म—इन दोनोंमेंसे कौन मृत्युके पश्चात् महान् फल देनेवाला होता है? किसका फल श्रेष्ठ बताया गया है? कैसे ब्राह्मणोंको कब दान देना चाहिये और किस प्रकार कब यज्ञ करना चाहिये? मैं इस बातको यथार्थरूपसे जानना चाहता हूँ। विद्वन्! आप मुझ जिज्ञासुको दानसम्बन्धी धर्म विस्तारपूर्वक बताइये ॥ १-२ ॥
अन्तर्वेद्यां च यद् दत्तं श्रद्धया चानृशंस्यतः ।
किंस्विन्नैःश्रेयसं तात तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ ३ ॥
तात पितामह! जो दान वेदीके भीतर श्रद्धापूर्वक दिया जाता है और जो वेदीके बाहर दयाभावसे प्रेरित होकर दिया जाता है; इन दोनोंमें कौन विशेष कल्याणकारी होता है? ॥ ३ ॥
भीष्म उवाच
रौद्रं कर्म क्षत्रियस्य सततं तात वर्तते ।
तस्य वैतानिकं कर्म दानं चैवेह पावनम् ॥ ४ ॥
**भीष्मजीने कहा—**बेटा! क्षत्रियको सदा कठोर कर्म करने पड़ते हैं, अतः यहाँ यज्ञ और दान ही उसे पवित्र करनेवाले कर्म हैं ॥ ४ ॥
न तु पापकृतां राज्ञां प्रतिगृह्णन्ति साधवः ।
एतस्मात् कारणाद् यज्ञैर्यजेद् राजाऽऽप्तदक्षिणैः ॥ ५ ॥
श्रेष्ठ पुरुष पाप करनेवाले राजाका दान नहीं लेते हैं; इसलिये राजाको पर्याप्त दक्षिणा देकर यज्ञोंका अनुष्ठान करना चाहिये ॥ ५ ॥
अथ चेत् प्रतिगृह्णीयुर्दद्यादहरहर्नृपः ।
श्रद्धामास्थाय परमां पावनं ह्येतदुत्तमम् ॥ ६ ॥
श्रेष्ठ पुरुष यदि दान स्वीकार करें तो राजाको उन्हें प्रतिदिन बड़ी श्रद्धाके साथ दान देना चाहिये; क्योंकि श्रद्धापूर्वक दिया हुआ दान आत्मशुद्धिका सर्वोत्तम साधन है ॥ ६ ॥