भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 577, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 577

ब्राह्मणांस्तर्पयन् द्रव्यैस्ततो यज्ञे यतव्रतः । मैत्रान् साधून् वेदविदः शीलवृत्ततपोर्जितान् ॥ ७ ॥ तुम नियमपूर्वक यज्ञमें सुशील, सदाचारी, तपस्वी, वेदवेत्ता, सबसे मैत्री रखनेवाले तथा साधु स्वभाववाले ब्राह्मणोंको धन देकर संतुष्ट करो ॥ ७ ॥

यत् ते ते न करिष्यन्ति कृतं ते न भविष्यति । यज्ञान् साधय साधुभ्यः स्वाद्वन्नान् दक्षिणावतः ॥ ८ ॥ यदि वे तुम्हारा दान स्वीकार नहीं करेंगे तो तुम्हें पुण्य नहीं होगा; अतः श्रेष्ठ पुरुषोंके लिये स्वादिष्ट अन्न और दक्षिणासे युक्त यज्ञोंका अनुष्ठान करो ॥ ८ ॥

इष्टं दत्तं च मन्येथा आत्मानं दानकर्मणा । पूजयेथा यायजूकांस्तवाप्यंशो भवेद् यथा ॥ ९ ॥ याज्ञिक पुरुषोंको दान करके ही तुम अपनेको यज्ञ और दानके पुण्यका भागी समझ लो। यज्ञ करनेवाले ब्राह्मणोंका सदा सम्मान करो। इससे तुम्हें भी यज्ञका आंशिक फल प्राप्त होगा ॥ ९ ॥

(विद्वद्भ्यः सम्प्रदानेन तत्राप्यंशोऽस्य पूजया । यज्वभ्यश्चाथ विद्वद्भ्यो दत्त्वा लोकं प्रदापयेत् ॥ प्रदद्याज्ज्ञानदातॄणां ज्ञानदानांशभाग् भवेत् ।) विद्वानोंको दान देनेसे, उनकी पूजा करनेसे दाता और पूजकको यज्ञका आंशिक फल प्राप्त होता है। यज्ञकर्ताओं तथा ज्ञानी पुरुषोंको दान देनेसे वह दान उत्तम लोककी प्राप्ति कराता है। जो दूसरोंको ज्ञानदान करते हैं, उन्हें भी अन्न और धनका दान करे। इससे दाता उनके ज्ञानदानके आंशिक पुण्यका भागी होता है ।।

प्रजावतो भरेथाश्च ब्राह्मणान् बहुकारिणः । प्रजावांस्तेन भवति यथा जनयिता तथा ॥ १० ॥ जो बहुतोंका उपकार करनेवाले और बाल-बच्चेवाले ब्राह्मणोंका पालन-पोषण करता है वह उस शुभ कर्मके प्रभावसे प्रजापतिके समान संतानवान् होता है ॥ १० ॥

यावतः साधुधर्मान् वै सन्तः संवर्धयन्त्युत । सर्वस्वैश्चापि भर्तव्या नरा ये बहुकारिणः ॥ ११ ॥ जो संत पुरुष सदा समस्त सद्धर्मोंका प्रचार और विस्तार करते रहते हैं, अपना सर्वस्व देकर भी उनका भरण-पोषण करना चाहिये; क्योंकि वे राजाके अत्यन्त उपकारी होते हैं ॥ ११ ॥

समृद्धः सम्प्रयच्छ त्वं ब्राह्मणेभ्यो युधिष्ठिर । धेनूरनडुहोऽन्नानि छत्रं वासांस्युपानहौ ॥ १२ ॥ युधिष्ठिर! तुम समृद्धिशाली हो, इसलिये ब्राह्मणोंको गाय, बैल, अन्न, छाता, जूता और वस्त्र दान करते रहो ॥ १२ ॥