महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 578, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंआज्यानि यजमानेभ्यस्तथान्नानि च भारत । अश्ववन्ति च यानानि वेश्मानि शयनानि च ॥ १३ ॥ एते देया व्युष्टिमन्तो लघूपायाश्च भारत । भारत! जो ब्राह्मण यज्ञ करते हों, उन्हें घी, अन्न, घोड़े जुते हुए रथ आदिकी सवारियाँ, घर और शय्या आदि वस्तुएँ देनी चाहिये। भरतनन्दन! राजाके लिये ये दान सरलतासे होनेवाले और समृद्धिको बढ़ानेवाले हैं ॥ १३ १/२ ॥
अजुगुप्सांश्च विज्ञाय ब्राह्मणान् वृत्तिकर्शितान् ॥ १४ ॥ उपच्छन्नं प्रकाशं वा वृत्त्या तान् प्रतिपालयेत् । जिन ब्राह्मणोंका आचरण निन्दित न हो, वे यदि जीविकाके बिना कष्ट पा रहे हों तो उनका पता लगाकर गुप्त या प्रकट रूपमें जीविकाका प्रबन्ध करके सदा उनका पालन करते रहना चाहिये ॥ १४ १/२ ॥
राजसूयाश्वमेधाभ्यां श्रेयस्तत् क्षत्रियान् प्रति ॥ १५ ॥ एवं पापैर्विनिर्मुक्तस्त्वं पूतः स्वर्गमाप्स्यसि । क्षत्रियोंके लिये वह कार्य राजसूय और अश्वमेध यज्ञोंसे भी अधिक कल्याणकारी है। ऐसा करनेसे तुम सब पापोंसे मुक्त एवं पवित्र होकर स्वर्गलोकमें जाओगे ॥
संचयित्वा पुनः कोशं यद् राष्ट्रं पालयिष्यसि ॥ १६ ॥ तेन त्वं ब्रह्मभूयत्वमवाप्स्यसि धनानि च । कोशका संग्रह करके यदि तुम उसके द्वारा राष्ट्रकी रक्षा करोगे तो तुम्हें दूसरे जन्मोंमें धन और ब्राह्मणत्वकी प्राप्ति होगी ॥ १६ १/२ ॥
आत्मनश्च परेषां च वृत्तिं संरक्ष भारत ॥ १७ ॥ पुत्रवच्चापि भृत्यान् स्वान् प्रजाश्च परिपालय । भरतनन्दन! तुम अपनी और दूसरोंकी भी जीविकाकी रक्षा करो तथा अपने सेवकों और प्रजाजनोंका पुत्रकी भाँति पालन करो ॥ १७ १/२ ॥
योगः क्षेमश्च ते नित्यं ब्राह्मणेष्वस्तु भारत ॥ १८ ॥ तदर्थं जीवितं तेऽस्तु मा तेभ्योऽप्रतिपालनम् । भारत! ब्राह्मणोंके पास जो वस्तु न हो, उसे उनको देना और जो हो उसकी रक्षा करना भी तुम्हारा नित्य कर्तव्य है। तुम्हारा जीवन उन्हींकी सेवामें लग जाना चाहिये। उनकी रक्षासे तुम्हें कभी मुँह नहीं मोड़ना चाहिये ॥ १८ १/२ ॥
अनर्थो ब्राह्मणस्यैष यद् वित्तनिचयो महान् ॥ १९ ॥ श्रिया ह्यभीक्ष्णं संवासो दर्पयेत् सम्प्रमोहयेत् । ब्राह्मणोंके पास यदि बहुत धन इकट्ठा हो जाय तो यह उनके लिये अनर्थका ही कारण होता है; क्योंकि लक्ष्मीका निरन्तर सहवास उन्हें दर्प और मोहमें डाल देता है ॥ १९ १/२ ॥