महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 579, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्राह्मणेषु प्रमूढेषु धर्मो विप्रणशेद् ध्रुवम् । धर्मप्रणाशे भूतानामभावः स्यान्न संशयः ॥ २० ॥ ब्राह्मण जब मोहग्रस्त होते हैं, तब निश्चय ही धर्मका नाश हो जाता है और धर्मका नाश होनेपर प्राणियोंका भी विनाश हो जाता है, इसमें संशय नहीं है ॥ २० ॥
यो रक्षिभ्यः सम्प्रदाय राजा राष्ट्रं विलुम्पति । यज्ञे राष्ट्राद् धनं तस्मादानयध्वमिति ब्रुवन् ॥ २१ ॥ यच्चादाय तदाज्ञप्तं भीतं दत्तं सुदारुणम् । यजेद् राजा न तं यज्ञं प्रशंसन्त्यस्य साधवः ॥ २२ ॥ जो राजा प्रजासे करके रूपमें प्राप्त हुए धनको कोषकी रक्षा करनेवाले कोषाध्यक्ष आदिको देकर खजानेमें रखवा लेता है और अपने कर्मचारियोंको यह आज्ञा देता है कि 'तुम लोग यज्ञके लिये राज्यसे धन वसूलकर ले आओ', इस प्रकार यज्ञके नामपर जो राज्यकी प्रजाको लूटता है तथा उसकी आज्ञाके अनुसार लोगोंको डरा-धमकाकर निष्ठुरतापूर्वक लाये हुए धनको लेकर जो उसके द्वारा यज्ञका अनुष्ठान करता है, उस राजाके ऐसे यज्ञकी श्रेष्ठ पुरुष प्रशंसा नहीं करते हैं ॥ २१-२२ ॥
अपीडिताः सुसंवृद्धा ये ददत्यनुकूलतः । तादृशेनाप्युपायेन यष्टव्यं नोद्यमाहृतैः ॥ २३ ॥ इसलिये जो लोग बहुत धनी हों और बिना पीड़ा दिये ही अनुकूलतापूर्वक धन दे सकें, उनके दिये हुए अथवा वैसे ही मृदु उपायसे प्राप्त हुए धनके द्वारा यज्ञ करना चाहिये; प्रजापीड़नरूप कठोर प्रयत्नसे लाये हुए धनके द्वारा नहीं ॥ २३ ॥
यदा परिनिषिच्येत निहितो वै यथाविधि । तदा राजा महायज्ञैर्यजेत बहुदक्षिणैः ॥ २४ ॥ जब राजाका विधिपूर्वक राज्याभिषेक हो जाय और वह राज्यासनपर बैठ जाय तब राजा बहुत-सी दक्षिणाओंसे युक्त महान् यज्ञका अनुष्ठान करे ॥ २४ ॥
वृद्धबालधनं रक्ष्यमन्धस्य कृपणस्य च । न खातपूर्वं कुर्वीत न रुदन्ती धनं हरेत् ॥ २५ ॥ राजा वृद्ध, बालक, दीन और अन्धे मनुष्यके धनकी रक्षा करे। पानी न बरसनेपर जब प्रजा कुआँ खोदकर किसी तरह सिंचाई करके कुछ अन्न पैदा करे और उसीसे जीविका चलाती हो तो राजाको वह धन नहीं लेना चाहिये तथा किसी क्लेशमें पड़कर रोती हुई स्त्रीका भी धन न ले ॥ २५ ॥
हृतं कृपणवित्तं हि राष्ट्रं हन्ति नृपश्रियम् । दद्याच्च महतो भोगान् क्षुद्रयं प्रणोदेत् सताम् ॥ २६ ॥ यदि किसी दरिद्रका धन छीन लिया जाय तो वह राजाके राज्यका और लक्ष्मीका विनाश कर देता है। अतः राजाको चाहिये कि दीनोंका धन न लेकर उन्हें महान् भोग अर्पित