महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 622, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंसप्तषष्टितमोऽध्यायः
अन्न और जलके दानकी महिमा
युधिष्ठिर उवाच
श्रुतं दानफलं तात यत् त्वया परिकीर्तितम् ।
अन्नदानं विशेषेण प्रशस्तमिह भारत ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— तात! भरतनन्दन! आपने जो दानोंका फल बताया है, उसे मैंने सुन लिया। यहाँ अन्नदानकी विशेषरूपसे प्रशंसा की गयी है ॥ १ ॥
पानीयदानमेवैतत् कथं चेह महाफलम् ।
इत्येतच्छ्रोतुमिच्छामि विस्तरेण पितामह ॥ २ ॥
पितामह! अब जलदान करनेसे कैसे महान् फलकी प्राप्ति होती है, इस विषयको मैं विस्तारके साथ सुनना चाहता हूँ ॥ २ ॥
भीष्म उवाच
हन्त ते वर्तयिष्यामि यथावद् भरतर्षभ ।
गदतस्तन्ममाद्येह शृणु सत्यपराक्रम ॥ ३ ॥
भीष्मजी कहते हैं— सत्यपराक्रमी भरतश्रेष्ठ! मैं तुम्हें सब कुछ यथार्थ रूपसे बताऊँगा। तुम आज यहाँ मेरे मुँहसे इन सब बातोंको सुनो ॥ ३ ॥
पानीयदानात् प्रभृति सर्वं वक्ष्यामि तेऽनघ ।
यदन्नं यच्च पानीयं सम्प्रदायाश्नुते नरः ॥ ४ ॥
अनघ! जलदानसे लेकर सब प्रकारके दानोंका फल मैं तुम्हें बताऊँगा। मनुष्य अन्न और जलका दान करके जिस फलको पाता है, वह सुनो ॥ ४ ॥
न तस्मात् परमं दानं किंचिदस्तीति मे मनः ।
अन्नात् प्राणभृतस्तात प्रवर्तन्ते हि सर्वशः ॥ ५ ॥
तात! मेरे मनमें यह धारणा है कि अन्न और जलके दानसे बढ़कर दूसरा कोई दान नहीं है; क्योंकि अन्नसे ही सब प्राणी उत्पन्न होते और जीवन धारण करते हैं ॥ ५ ॥
तस्मादन्नं परं लोके सर्वलोकेषु कथ्यते ।
अन्नाद् बलं च तेजश्च प्राणिनां वर्धते सदा ॥ ६ ॥
अन्नदानमतस्तस्माच्छ्रेष्ठमाह प्रजापतिः ।
इसलिये लोकमें तथा सम्पूर्ण मनुष्योंमें अन्नको ही सबसे उत्तम बताया गया है। अन्नसे ही सदा प्राणियोंके तेज और बलकी वृद्धि होती है; अतः प्रजापतिने अन्नके दानको ही सर्वश्रेष्ठ बतलाया है ॥ ६ १/२ ॥