महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 621, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंन स दुर्गाण्यवाप्नोतीत्येवमाह पराशरः ॥ ६० ॥
पराशर मुनिका कथन है कि 'जो मनुष्य सदा एकाग्रचित्त होकर याचकको तत्काल अन्नका दान करता है, उसपर कभी दुर्गम संकट नहीं पड़ता' ॥ ६० ॥
अर्चयित्वा यथान्यायं देवेभ्योऽन्नं निवेदयेत् ।
यदन्ना हि नरा राजंस्तदन्नास्तस्य देवताः ॥ ६१ ॥
राजन्! मनुष्यको प्रतिदिन शास्त्रोक्त विधिसे देवताओंकी पूजा करके उन्हें अन्न निवेदन करना चाहिये। जो पुरुष जिस अन्नका भोजन करता है, उसके देवता भी वही अन्न ग्रहण करते हैं ॥ ६१ ॥
कौमुदे शुक्लपक्षे तु योऽन्नदानं करोत्युत ।
स संतरति दुर्गाणि प्रेत्य चानन्त्यमश्नुते ॥ ६२ ॥
जो कार्तिक मासके शुक्लपक्षमें अन्नका दान करता है, वह दुर्गम संकटसे पार हो जाता है और मरकर अक्षय सुखका भागी होता है ॥ ६२ ॥
अभुक्त्वातिथये चान्नं प्रयच्छेद् यः समाहितः ।
स वै ब्रह्मविदां लोकान् प्राप्नुयाद् भरतर्षभ ॥ ६३ ॥
भरतश्रेष्ठ! जो पुरुष एकाग्रचित्त हो स्वयं भूखा रहकर अतिथिको अन्नदान करता है, वह ब्रह्मवेत्ताओंके लोकोंमें जाता है ॥ ६३ ॥
सुकृच्छ्रामापदं प्राप्तश्चान्नदः पुरुषस्तरेत् ।
पापं तरति चैवेह दुष्कृतं चापकर्षति ॥ ६४ ॥
अन्नदाता मनुष्य कठिन-से-कठिन आपत्तिमें पड़नेपर भी उस आपत्तिसे पार हो जाता है। वह पापसे उद्धार पा जाता है और भविष्यमें होनेवाले दुष्कर्मोंका भी नाश कर देता है ॥ ६४ ॥
इत्येतदन्नदानस्य तिलदानस्य चैव ह ।
भूमिदानस्य च फलं गोदानस्य च कीर्तितम् ॥ ६५ ॥
इस प्रकार मैंने यह अन्नदान, तिलदान, भूमिदान और गोदानका फल बताया है ॥ ६५ ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि षट्षष्टितमोऽध्यायः ॥ ६६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें छाछठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६६ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका ३/४ श्लोक मिलाकर कुल ६५ ३/४ श्लोक हैं)