भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 620, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 620

ददत् स तादृशानां वै नरो गां पापकर्मणाम्। अक्षयं नरकं यातीत्येवमाहुर्महर्षयः ॥ ५२ ॥ ऐसे पापकर्मों मनुष्योंको जो गाय देता है, वह मनुष्य अक्षय नरकमें गिरता है, ऐसा महर्षियोंका कथन है ॥ ५२ ॥

न कृशां नापवत्सां वा वन्ध्यां रोगान्वितां तथा। न व्यंगां न परिश्रान्तां दद्याद् गां ब्राह्मणाय वै ॥ ५३ ॥ जो दुबली हो, जिसका बछड़ा मर गया हो तथा जो ठाँठ, रोगिणी, किसी अंगसे हीन और थकी हुई (बूढ़ी) हो, ऐसी गौ ब्राह्मणको नहीं देनी चाहिये ॥ ५३ ॥

दशगोसहस्रदो हि शक्रेण सह मोदते। अक्षयाँल्लभते लोकान् नरः शतसहस्रशः ॥ ५४ ॥ दस हजार गोदान करनेवाला मनुष्य इन्द्रके साथ रहकर आनन्द भोगता है और जो लाख गौओंका दान कर देता है, उस मनुष्यको अक्षय लोक प्राप्त होते हैं ॥

इत्येतद् गोप्रदानं च तिलदानं च कीर्तितम्। तथा भूमिप्रदानं च शृणुष्वान्ने च भारत ॥ ५५ ॥ भारत! इस प्रकार गोदान, तिलदान और भूमिदानका महत्त्व बतलाया गया। अब पुनः अन्नदानकी महिमा सुनो ॥

अन्नदानं प्रधानं हि कौन्तेय परिचक्षते। अन्नस्य हि प्रदानेन रन्तिदेवो दिवं गतः ॥ ५६ ॥ कुन्तीनन्दन! विद्वान् पुरुष अन्नदानको सब दानोंमें प्रधान बताते हैं। अन्नदान करनेसे ही राजा रन्तिदेव स्वर्गलोकमें गये थे ॥ ५६ ॥

श्रान्ताय क्षुधितायान्नं यः प्रयच्छति भूमिपः। स्वायम्भुवं महत् स्थानं स गच्छति नराधिप ॥ ५७ ॥ नरेश्वर! जो भूमिपाल थके-माँदे और भूखे मनुष्यको अन्न देता है, वह ब्रह्माजीके परमधाममें जाता है ॥ ५७ ॥

न हिरण्यैर्न वासोभिर्नान्यदानेन भारत। प्राप्नुवन्ति नराः श्रेयो यथा ह्यन्नप्रदाः प्रभो ॥ ५८ ॥ भरतनन्दन! प्रभो! अन्नदान करनेवाले मनुष्य जिस तरह कल्याणके भागी होते हैं, वैसा कल्याण उन्हें सुवर्ण, वस्त्र तथा अन्य वस्तुओंके दानसे नहीं प्राप्त होता है ॥ ५८ ॥

अन्नं वै प्रथमं द्रव्यमन्नं श्रीश्च परा मता। अन्नात् प्राणः प्रभवति तेजो वीर्यं बलं तथा ॥ ५९ ॥ अन्न प्रथम द्रव्य है। वह उत्तम लक्ष्मीका स्वरूप माना गया है। अन्नसे ही प्राण, तेज, वीर्य और बलकी पुष्टि होती है ॥ ५९ ॥

सद्यो ददाति यश्चान्नं सदैकाग्रमना नरः।