महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 667, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंउपाध्यायेन गदितं मम चेदं युधिष्ठिर । य इदं ब्राह्मणो नित्यं वदेद् ब्राह्मणसंसदि ॥ १४ ॥ यज्ञेषु गोप्रदानेषु द्वयोरपि समागमे । तस्य लोकाः किलाक्षय्या दैवतैः सह नित्यदा ॥ १५ ॥ (इति ब्रह्मा स भगवान् उवाच परमेश्वरः)
युधिष्ठिर! मुझसे मेरे उपाध्याय (परशुरामजी) ने इस विषयका वर्णन किया था। जो ब्राह्मण अपनी मण्डलीमें बैठकर प्रतिदिन इस उपदेशको दुहराता है और यज्ञमें, गोदानके समय तथा दो व्यक्तियोंके भी समागममें इसकी चर्चा करता है, उसको सदा देवताओंके साथ अक्षयलोक प्राप्त होते हैं। यह बात भी परमेश्वर भगवान् ब्रह्माने स्वयं ही इन्द्रको बतायी है ॥ १४-१५ ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि चतुःसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें चौहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७४ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १/३ श्लोक मिलाकर कुल १५ १/३ श्लोक हैं)