महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 674, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंषट्सप्ततितमोऽध्यायः
गोदानकी विधि, गौओंसे प्रार्थना, गौओंके निष्क्रय और गोदान करनेवाले नरेशोंके नाम
युधिष्ठिर उवाच
विधिं गवां परं श्रोतुमिच्छामि नृप तत्त्वतः ।
येन तान् शाश्वताँल्लोकानर्थिनां प्राप्नुयादिह ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने कहा—**नरेश्वर! अब मैं गोदानकी उत्तम विधिका यथार्थरूपसे श्रवण करना चाहता हूँ; जिससे प्रार्थी पुरुषोंके लिये अभीष्ट सनातन लोकोंकी प्राप्ति होती है ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
न गोदानात् परं किंचिद् विद्यते वसुधाधिप ।
गौर्हि न्यायागता दत्ता सद्यस्तारयते कुलम् ॥ २ ॥
**भीष्मजीने कहा—**पृथ्वीनाथ! गोदानसे बढ़कर कुछ भी नहीं है। यदि न्यायपूर्वक प्राप्त हुई गौका दान किया जाय तो वह समस्त कुलका तत्काल उद्धार कर देती है ॥ २ ॥
सतामर्थे सम्यगुत्पादितो यः
स वै कॢप्तः सम्यगाभ्यः प्रजाभ्यः ।
तस्मात् पूर्वं ह्यादिकालप्रवृत्तं
गोदानार्थं शृणु राजन् विधिं मे ॥ ३ ॥
राजन्! ऋषियोंने सत्पुरुषोंके लिये समीचीन भावसे जिस विधिको प्रकट किया है, वही इन प्रजाजनोंके लिये भलीभाँति निश्चित किया गया है। इसलिये तुम आदिकालसे प्रचलित हुई गोदानकी उस उत्तम विधिका मुझसे श्रवण करो ॥ ३ ॥
पुरा गोषूपनीतासु गोषु संदिग्धदर्शिना ।
मान्धात्रा प्रकृतं प्रश्नं बृहस्पतिरभाषत ॥ ४ ॥
पूर्वकालकी बात है, जब महाराज मान्धाताके पास बहुत-सी गौएँ दानके लिये लायी गयीं, तब उन्होंने ‘कैसी गौ दान करे?’ इस संदेहमें पड़कर बृहस्पतिजीसे तुम्हारी ही तरह प्रश्न किया। उस प्रश्नके उत्तरमें बृहस्पतिजीने इस प्रकार कहा— ॥ ४ ॥
द्विजातिमतिसत्कृत्य श्वः कालमभिवेद्य च ।
गोदानार्थे प्रयुञ्जीत रोहिणीं नियतव्रतः ॥ ५ ॥
आह्वानं च प्रयुञ्जीत समंगे बहुलेति च ।
प्रविश्य च गवां मध्यमिमां श्रुतिमुदाहरेत् ॥ ६ ॥