महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगोदान करनेवाले मनुष्यको चाहिये कि वह नियमपूर्वक व्रतका पालन करे और ब्राह्मणको बुलाकर उसका अच्छी तरह सत्कार करके कहे कि 'मैं कल प्रातःकाल आपको एक गौ दान करूँगा।' तत्पश्चात् गोदानके लिये वह लाल रंगकी (रोहिणी) गौ मँगवाये और 'समंगे बहुले' इस प्रकार कहकर गायको सम्बोधित करे, फिर गौओंके बीचमें प्रवेश करके इस निम्नांकित श्रुतिका उच्चारण करे— ।। ५-६ ।।
गौर्मे माता वृषभः पिता मे दिवं शर्म जगती मे प्रतिष्ठा । प्रपद्यैवं शर्वरीमुष्य गोषु पुनर्वाणीमुत्सृजेद् गोप्रदाने ।। ७ ।। ‘गौ मेरी माता है। वृषभ (बैल) मेरा पिता है। वे दोनों मुझे स्वर्ग तथा ऐहिक सुख प्रदान करें। गौ ही मेरा आधार है।' ऐसा कहकर गौओंकी शरण ले और उन्हींके साथ मौनावलम्बनपूर्वक रात बिताकर सबेरे गोदानकालमें ही मौन भंग करे—बोले ।। ७ ।।
स तामेकां निशां गोभिः समसख्यः समव्रतः । ऐकात्म्यगमनात् सद्यः कलुषाद् विप्रमुच्यते ।। ८ ।। इस प्रकार गौओंके साथ एक रात रहकर उनके समान व्रतका पालन करते हुए उन्हींके साथ एकात्मभावको प्राप्त होनेसे मनुष्य तत्काल सब पापोंसे छूट जाता है ।।
उत्सृष्टवृषवत्सा हि प्रदेया सूर्यदर्शने । त्रिदिवं प्रतिपत्तव्यमर्थवादाशिषस्तव ।। ९ ।। राजन्! सूर्योदयके समय बछड़ेसहित गौका तुम्हें दान करना चाहिये। इससे स्वर्गलोककी प्राप्ति होगी और अर्थवाद मन्त्रोंमें जो आशीः (प्रार्थना) की गयी है, वह तुम्हारे लिये सफल होगी ।। ९ ।।
ऊर्जस्विन्य ऊर्जमेधाश्च यज्ञे गर्भोऽमृतस्य जगतोऽस्य प्रतिष्ठा । क्षिते रोहः प्रवहः शश्वदेव प्राजापत्याः सर्वमित्यर्थवादाः ।। १० ।। (वे मन्त्र इस प्रकार हैं, गोदानके पश्चात् इनके द्वारा प्रार्थना करनी चाहिये—) ‘गौएँ उत्साहसम्पन्न, बल और बुद्धिसे युक्त, यज्ञमें काम आनेवाले अमृतस्वरूप हविष्यके उत्पत्तिस्थान, इस जगत्की प्रतिष्ठा (आश्रय), पृथ्वीपर बैलोंके द्वारा खेती उपजानेवाली, संसारके अनादि प्रवाहको प्रवृत्त करनेवाली और प्रजापतिकी पुत्री हैं। यह सब गौओंकी प्रशंसा है ।। १० ।।
गावो ममैनः प्रणुदन्तु सौर्या- स्तथा सौम्याः स्वर्गयानाय सन्तु । आत्मानं मे मातृवच्चाश्रयन्तु