भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 676, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 676

यथानुक्ताः सन्तु सर्वाशिषो मे ॥ ११ ॥ ‘सूर्य और चन्द्रमाके अंशसे प्रकट हुई वे गौएँ हमारे पापोंका नाश करें। हमें स्वर्ग आदि उत्तम लोकोंकी प्राप्तिमें सहायता दें। माताकी भाँति शरण प्रदान करें। जिन इच्छाओंका इन मन्त्रोंद्वारा उल्लेख नहीं हुआ है और जिनका हुआ है, वे सभी गोमाताकी कृपासे मेरे लिये पूर्ण हों ॥ ११ ॥ शोषोत्सर्गे कर्मभिर्देहमोक्षे सरस्वत्यः श्रेयसे सम्प्रवृत्ताः । यूयं नित्यं सर्वपुण्योपवाह्यां दिशध्वं मे गतिमिष्टां प्रसन्नाः ॥ १२ ॥ ‘गौओ! जो लोग तुम्हारी सेवा करते हुए तुम्हारी आराधनामें लगे रहते हैं, उनके उन कर्मोंसे प्रसन्न होकर तुम उन्हें क्षय आदि रोगोंसे छुटकारा दिलाती हो और ज्ञानकी प्राप्ति कराकर उन्हें देहबन्धनसे भी मुक्त कर देती हो। जो मनुष्य तुम्हारी सेवा करते हैं, उनके कल्याणके लिये तुम सरस्वती नदीकी भाँति सदा प्रयत्नशील रहती हो। गोमाताओ! तुम हमारे ऊपर सदा प्रसन्न रहो और हमें समस्त पुण्योंके द्वारा प्राप्त होनेवाली अभीष्ट गति प्रदान करो ॥ १२ ॥ या वै यूयं सोऽहमद्यैव भावो युष्मान् दत्त्वा चाहमात्मप्रदाता । मनश्च्युता मन एवोपपन्नाः संधुक्षध्वं सौम्यरूपोग्ररूपाः ॥ १३ ॥ एवं तस्याग्रे पूर्वमर्धं वदेत गवां दाता विधिवत् पूर्वदृष्टः । प्रतिब्रूयाच्छेषमर्धं द्विजातिः प्रतिगृह्णन् वै गोप्रदाने विधिज्ञः ॥ १४ ॥ ‘इसके बाद प्रथम दृष्टिपथमें आया हुआ दाता पहले विधिपूर्वक निम्नांकित आधे श्लोकका उच्चारण करे ‘या वै यूयं सोऽहमद्यैव भावो युष्मान् दत्त्वा चाहमात्मप्रदाता ।’—गौओ! तुम्हारा जो स्वरूप है, वही मेरा भी है—तुममें और हममें कोई अन्तर नहीं है; अतः आज तुम्हें दानमें देकर हमने अपने आपको ही दान कर दिया है।’ दाताके ऐसा कहनेपर दान लेनेवाला गोदानविधिका ज्ञाता ब्राह्मण शेष आधे श्लोकका उच्चारण करे—‘मनश्च्युता मन एवोपपन्नाः संधुक्षध्वं सौम्य-रूपोग्ररूपाः ।’—गौओ! तुम शान्त और प्रचण्डरूप धारण करनेवाली हो। अब तुम्हारे ऊपर दाताका ममत्व (अधिकार) नहीं रहा, अब तुम मेरे अधिकारमें आ गयी हो; अतः अभीष्ट भोग प्रदान करके तुम मुझे और दाताको भी प्रसन्न करो’ ॥ १३-१४ ॥ गोप्रदानीति वक्तव्यमर्घ्यवस्त्रवसुप्रदः ।