भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 677, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 677

ऊर्ध्वास्या भवितव्या च वैष्णवीति च चोदयेत् ।। १५ ।।
नाम संकीर्तयेत् तस्या यथासंख्योत्तरं स वै ।
'जो गौके निष्क्रयरूपसे उसका मूल्य, वस्त्र अथवा सुवर्ण दान करता है, उसको भी गोदाता ही कहना चाहिये। मूल्य, वस्त्र एवं सुवर्णरूपमें दी जानेवाली गौओंका नाम क्रमशः ऊर्ध्वास्या, भवितव्या और वैष्णवी है। संकल्पके समय इनके इन्हीं नामोंका उच्चारण करना चाहिये अर्थात् 'इमां ऊर्ध्वास्यां' 'इमां भवितव्यां' 'इमां वैष्णवीं' तुभ्यमहं संप्रददे त्वं गृहाण—मैं यह ऊर्ध्वास्या, भवितव्या या वैष्णवी गौ आपको दे रहा हूँ, आप इसे ग्रहण करें।'-ऐसा कहकर ब्राह्मणको वह दान ग्रहण करनेके लिये प्रेरित करना चाहिये ।। १५ १/२ ।।

फलं षट्त्रिंशदष्टौ च सहस्राणि च विंशतिः ।। १६ ।।
एवमेतान् गुणान् विद्याद् गवादीनां यथाक्रमम् ।
गोप्रदाता समाप्नोति समस्तानष्टमे क्रमे ।। १७ ।।
'इनके दानका फल क्रमशः इस प्रकार है—गौका मूल्य देनेवाला छत्तीस हजार वर्षोंतक, गौकी जगह वस्त्र दान करनेवाला आठ हजार वर्षोंतक तथा गौके स्थानमें सुवर्ण देनेवाला पुरुष बीस हजार वर्षोंतक परलोकमें सुख भोगता है। इस प्रकार गौओंके निष्क्रय दानका क्रमशः फल बताया गया है। इसे अच्छी तरह जान लेना चाहिये। साक्षात् गौका दान लेकर जब ब्राह्मण अपने घरकी ओर जाने लगता है, उस समय उसके आठ पग जाते-जाते ही दाताको अपने दानका फल मिल जाता है ।। १६-१७ ।।

गोदः शीली निर्भयश्चार्थदाता
न स्याद् दुःखी वसुदाता च कामम् ।
उषस्योत्था भारते यश्च विद्वान्
विख्यातास्ते वैष्णवाश्चन्द्रलोकाः ।। १८ ।।
'साक्षात् गौका दान करनेवाला शीलवान् और उसका मूल्य देनेवाला निर्भय होता है तथा गौकी जगह इच्छानुसार सुवर्ण दान करनेवाला मनुष्य कभी दुःखमें नहीं पड़ता है। जो प्रातःकाल उठकर नैतिक नियमोंका अनुष्ठान करनेवाला और महाभारतका विद्वान् है तथा जो विख्यात वैष्णव हैं, वे सब चन्द्रलोकमें जाते हैं ।। १८ ।।

गा वै दत्त्वा गोव्रती स्यात् त्रिरात्रं
निशां चैकां संवसेतेह ताभिः ।
कामाष्टम्यां वर्तितव्यं त्रिरात्रं
रसैर्वा गोः शकृता प्रस्नवैर्वा ।। १९ ।।
'गौका दान करनेके पश्चात् मनुष्यको तीन राततक गोव्रतका पालन करना चाहिये और यहाँ एक रात गौओंके साथ रहना चाहिये। कामाष्टमीसे लेकर तीन राततक गोबर, गोदुग्ध अथवा गोरसमात्रका आहार करना चाहिये ।। १९ ।।