भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 779, कुल 2566 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 779

⬅ विषय-सूची (TOC)

एकनवतितमोऽध्यायः

शोकातुर निमिका पुत्रके निमित्त पिण्डदान तथा श्राद्धके विषयमें निमिको महर्षि अत्रिका उपदेश, विश्वेदेवोंके नाम एवं श्राद्धमें त्याज्य वस्तुओंका वर्णन

युधिष्ठिर उवाच

केन संकल्पितं श्राद्धं कस्मिन् काले किमात्मकम् ।
भृग्वंगिरसिके काले मुनिना कतरेण वा ॥ १ ॥
कानि श्राद्धानि वर्ज्यानि कानि मूलफलानि च ।
धान्यजात्यश्च का वर्ज्यास्तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ २ ॥

**युधिष्ठिरने पूछा—**पितामह! श्राद्ध कब प्रचलित हुआ? सबसे पहले किस महर्षिने इसका संकल्प किया अर्थात् प्रचार किया? श्राद्धका स्वरूप क्या है? यदि भृगु और अंगिराके समयमें इसका प्रारम्भ हुआ तो किस मुनिने इसको प्रकट किया? श्राद्धमें कौन-कौनसे कर्म, कौन-कौनसे फल-मूल और कौन-कौनसे अन्न त्याग देने योग्य हैं? वह मुझसे कहिये ॥ १-२ ॥

भीष्म उवाच

यथा श्राद्धं सम्प्रवृत्तं यस्मिन् काले यदात्मकम् ।
येन संकल्पितं चैव तन्मे शृणु जनाधिप ॥ ३ ॥

**भीष्मजीने कहा—**राजन्! श्राद्धका जिस समय और जिस प्रकार प्रचलन हुआ, जो इसका स्वरूप है तथा सबसे पहले जिसने इसका संकल्प किया अर्थात् प्रचार किया, वह सब तुम्हें बता रहा हूँ, सुनो ॥ ३ ॥

स्वायम्भुवोऽत्रिः कौरव्य परमर्षिः प्रतापवान् ।
तस्य वंशे महाराज दत्तात्रेय इति स्मृतः ॥ ४ ॥

कुरुनन्दन! महाराज! प्राचीन कालमें ब्रह्माजीसे महर्षि अत्रिकी उत्पत्ति हुई। वे बड़े प्रतापी ऋषि थे। उनके वंशमें दत्तात्रेयजीका प्रादुर्भाव हुआ ॥ ४ ॥

दत्तात्रेयस्य पुत्रोऽभून्निमिर्नाम तपोधनः ।
निमेर्श्चाप्यभवत् पुत्रः श्रीमान्नाम श्रिया वृतः ॥ ५ ॥

दत्तात्रेयके पुत्र निमि हुए, जो बड़े तपस्वी थे। निमिके भी एक पुत्र हुआ, जिसका नाम था श्रीमान्। वह बड़ा कान्तिमान् था ॥ ५ ॥

पूर्णे वर्षसहस्रान्ते स कृत्वा दुष्करं तपः ।
कालधर्मपरीतात्मा निधनं समुपागतः ॥ ६ ॥