भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 780, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 780

उसने पूरे एक हजार वर्षोंतक बड़ी कठोर तपस्या करके अन्तमें काल-धर्मके अधीन होकर प्राण त्याग दिया ॥
निमिस्तु कृत्वा शौचानि विधिदृष्टेन कर्मणा ।
संतापमगमत् तीव्रं पुत्रशोकपरायणः ॥ ७ ॥
फिर निमि शास्त्रोक्त कर्मद्वारा अशौच निवारण करके पुत्र-शोकमें मग्न हो अत्यन्त संतप्त हो उठे ॥ ७ ॥
अथ कृत्वोपहार्याणि चतुर्दश्यां महामतिः ।
तमेव गणयन् शोकं विरात्रे प्रत्यबुध्यत ॥ ८ ॥
तदनन्तर परम बुद्धिमान् निमि चतुर्दशीके दिन श्राद्धमें देने योग्य सब वस्तुएँ एकत्रित करके पुत्रशोकसे ही चिन्तित हो रात बीतनेपर (अमावास्याको श्राद्ध करनेके लिये) प्रातःकाल उठे ॥ ८ ॥
तस्यासीत् प्रतिबुद्धस्य शोकेन व्यथितात्मनः ।
मनः संवृत्य विषये बुद्धिविस्तारगामिनी ॥ ९ ॥
ततः संचिन्तयामास श्राद्धकल्पं समाहितः ।
प्रातःकाल जागनेपर उनका मन पुत्रशोकसे व्यथित होता रहा; किन्तु उनकी बुद्धि बड़ी विस्तृत थी। उसके द्वारा उन्होंने मनको शोककी ओरसे हटाया और एकाग्रचित्त होकर श्राद्धविधिका विचार किया ॥ ९½ ॥
यानि तस्यैव भोज्यानि मूलानि च फलानि च ॥ १० ॥
उक्तानि यानि चान्नानि यानि चेष्टानि तस्य ह ।
तानि सर्वाणि मनसा विनिश्चित्य तपोधनः ॥ ११ ॥
फिर श्राद्धके लिये शास्त्रोंमें जो फल-मूल आदि भोज्य पदार्थ बताये गये हैं तथा उनमेंसे जो-जो पदार्थ उनके पुत्रको प्रिय थे, उन सबका मन-ही-मन निश्चय करके उन तपोधनने संग्रह किया ॥ १०-११ ॥
अमावास्यां महाप्राज्ञो विप्रानानाय्य पूजितान् ।
दक्षिणावर्तिकाः सर्वा बृसीः स्वयमथाकरोत् ॥ १२ ॥
तदनन्तर, उन महान् बुद्धिमान् मुनिने अमावास्याके दिन सात ब्राह्मणोंको बुलाकर उनकी पूजा की और उनके लिये स्वयं ही प्रदक्षिण भावसे मोड़े हुए कुशके आसन बनाकर उन्हें उनपर बिठाया ॥ १२ ॥
सप्त विप्रांस्ततो भोज्ये युगपत् समुपानयत् ।
ऋते च लवणं भोज्यं श्यामाकान्नं ददौ प्रभुः ॥ १३ ॥
प्रभावशाली निमिने उन सातोंको एक ही साथ भोजनके लिये अलोना साँवाँ परोसा ॥ १३ ॥
दक्षिणाग्रास्ततो दर्भा विष्टरेषु निवेशिताः ।