भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 781, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 781

पादयोश्चैव विप्राणां ये त्वन्नमुपभुञ्जते ॥ १४ ॥
कृत्वा च दक्षिणाग्रान् वै दर्भान् स प्रयत: शुचि: ।
प्रददौ श्रीमत: पिण्डान् नामगोत्रमुदाहरन् ॥ १५ ॥
इसके बाद भोजन करनेवाले ब्राह्मणोंके पैरोंके नीचे आसनोंपर उन्होंने दक्षिणाग्र कुश बिछा दिये और (अपने सामने भी) दक्षिणाग्र कुश रखकर पवित्र एवं सावधान हो अपने पुत्र श्रीमान्‌के नाम और गोत्रका उच्चारण करते हुए कुशोंपर पिण्डदान किया ॥ १४-१५ ॥

तत् कृत्वा स मुनिश्रेष्ठो धर्मसंकरमात्मन: ।
पश्चात्तापेन महता तप्यमानोऽभ्यचिन्तयत् ॥ १६ ॥
इस प्रकार श्राद्ध करनेके पश्चात् मुनिश्रेष्ठ निमि अपनेमें धर्मसंकरताका दोष मानकर (अर्थात् वेदमें पिता-पितामह आदिके उद्देश्यसे जिस श्राद्धका विधान है, उसको मैंने स्वेच्छासे पुत्रके निमित्त किया है—यह सोचकर) महान् पश्चात्तापसे संतप्त हो उठे और इस प्रकार चिन्ता करने लगे— ॥ १६ ॥

अकृतं मुनिभि: पूर्वं किं मयेदमनुष्ठितम् ।
कथं नु शापेन न मां दहेयुर्ब्राह्मणा इति ॥ १७ ॥
‘अहो! मुनियोंने जो कार्य पहले कभी नहीं किया, उसे मैंने ही क्यों कर डाला? मेरे इस मनमाने बर्तावको देखकर ब्राह्मणलोग मुझे अपने शापसे क्यों नहीं भस्म कर डालेंगे?’ ॥ १७ ॥

ततः संचिन्तयामास वंशकर्तारमात्मनः ।
ध्यातमात्रस्तथा चात्रिराजगाम तपोधनः ॥ १८ ॥
यह बात ध्यानमें आते ही उन्होंने अपने वंशप्रवर्तक महर्षि अत्रिका स्मरण किया। उनके चिन्तन करते ही तपोधन अत्रि वहाँ आ पहुँचे ॥ १८ ॥

अथात्रिस्तं तथा दृष्ट्वा पुत्रशोकेन कर्षितम् ।
भृशमाश्वासयामास वाग्भिरिष्टाभिरव्ययः ॥ १९ ॥
आनेपर जब अविनाशी अत्रिने निमिको पुत्रशोकसे व्याकुल देखा तब मधुर वाणीद्वारा उन्हें बहुत आश्वासन दिया— ॥ १९ ॥

निमे संकल्पितस्तेऽयं पितृयज्ञस्तपोधन ।
मा ते भूद् भी: पूर्वदृष्टो धर्मोऽयं ब्रह्मणा स्वयम् ॥ २० ॥
‘तपोधन निमे! तुमने जो यह पितृयज्ञ किया है, इससे डरो मत। सबसे पहले स्वयं ब्रह्माजीने इस धर्मका साक्षात्कार किया है ॥ २० ॥

सोऽयं स्वयम्भुविहितो धर्म: संकल्पितस्त्वया ।
ऋते स्वयम्भुव: कोऽन्य: श्राद्धेयं विधिमाहरेत् ॥ २१ ॥
‘अतः तुमने यह ब्रह्माजीके चलाये हुए धर्मका ही अनुष्ठान किया है। ब्रह्माजीके सिवा दूसरा कौन इस श्राद्धविधिका उपदेश कर सकता है ॥ २१ ॥