महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 782, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंअथाख्यास्यामि ते पुत्र श्राद्धेयं विधिमुत्तमम् । स्वयम्भुविहितं पुत्र तत् कुरुष्व निबोध मे ।। २२ ।। ‘बेटा! अब मैं तुमसे स्वयम्भू ब्रह्माजीकी बतायी हुई श्राद्धकी उत्तम विधिका वर्णन करता हूँ, इसे सुनो और सुनकर इसी विधिके अनुसार श्राद्धका अनुष्ठान करो ।। २२ ।। कृत्वाग्नौकरणं पूर्वं मन्त्रपूर्वं तपोधन । ततोऽग्नयेऽथ सोमाय वरुणाय च नित्यशः ।। २३ ।। विश्वेदेवाश्च ये नित्यं पितृभिः सह गोचराः । तेभ्यः संकल्पिता भागाः स्वयमेव स्वयम्भुवा ।। २४ ।। ‘तब तपोधन! पहले वेदमन्त्रके उच्चारणपूर्वक अग्नौकरण—अग्निकरणकी क्रिया पूरी करके अग्नि, सोम, वरुण और पितरोंके साथ नित्य रहनेवाले विश्वेदेवोंको उनका भाग सदा अर्पण करे। साक्षात् ब्रह्माजीने इनके भागोंकी कल्पना की है ।। २३-२४ ।। स्तोतव्या चेह पृथिवी निवापस्येह धारिणी । वैष्णवी काश्यपी चेति तथैवेहाक्षयेति च ।। २५ ।। ‘तदनन्तर श्राद्धकी आधारभूता पृथिवीकी वैष्णवी, काश्यपी और अक्षया आदि नामोंसे स्तुति करनी चाहिये ।। उदकानयने चैव स्तोतव्यो वरुणो विभुः । ततोऽग्निश्चैव सोमश्च आप्याय्याविहितेऽनघ ।। २६ ।। ‘अनघ! श्राद्धके लिये जल लानेके लिये भगवान् वरुणका स्तवन करना उचित है। इसके बाद तुम्हें अग्नि और सोमको भी तृप्त करना चाहिये ।। २६ ।। देवास्तु पितरो नाम निर्मिता ये स्वयम्भुवा । उष्मपा ये महाभागास्तेषां भागः प्रकल्पितः ।। २७ ।। ‘ब्रह्माजीके ही उत्पन्न किये हुए कुछ देवता पितरोंके नामसे प्रसिद्ध हैं। उन महाभाग पितरोंको उष्मप भी कहते हैं। स्वयम्भूने श्राद्धमें उनका भाग निश्चित किया है ।। २७ ।। ते श्राद्धेनार्च्यमाना वै विमुच्यन्ते ह किल्बिषात् । सप्तकः पितृवंशस्तु पूर्वदृष्टः स्वयम्भुवा ।। २८ ।। ‘श्राद्धके द्वारा उनकी पूजा करनेसे श्राद्धकर्ताके पितरोंका पापसे उद्धार हो जाता है। ब्रह्माजीने पूर्वकालमें जिन अग्निष्वात्त आदि पितरोंको श्राद्धका अधिकारी बताया है, उनकी संख्या सात है ।। २८ ।। विश्वे चाग्निमुखा देवाः संख्याताः पूर्वमेव ते । तेषां नामानि वक्ष्यामि भागार्हाणां महात्मनाम् ।। २९ ।। ‘विश्वेदेवोंकी चर्चा तो मैंने पहले ही की है, उन सबका मुख अग्नि है। यज्ञमें भाग पानेके अधिकारी उन महात्माओंके नामोंको कहता हूँ ।। २९ ।। बलं धृतिर्विपाप्मा च पुण्यकृत् पावनस्तथा ।