महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउत्तर तथा पश्चिमकी ओर सिर करके न सोये। विद्वान् पुरुषको पूर्व अथवा दक्षिणकी ओर सिर करके ही सोना चाहिये ।। ४८ ।।
न भग्ने नावशीर्णे च शयने प्रस्वपीत च । नान्तर्धाने न संयुक्ते न च तिर्यक् कदाचन ।। ४९ ।। टूटी और ढीली खाटपर नहीं सोना चाहिये। अँधेरेमें पड़ी हुई शय्यापर भी सहसा शयन करना उचित नहीं है (उजाला करके उसे अच्छी तरह देख लेना चाहिये)। किसी दूसरेके साथ एक खाटपर न सोये। इसी तरह पलंगपर कभी तिरछा होकर नहीं, सदा सीधे ही सोना चाहिये ।। ४९ ।।
न चापि गच्छेत् कार्येण समयाद् वापि नास्तिकैः । आसनं तु पदाऽऽकृष्य न प्रसज्जेत् तथा नरः ।। ५० ।। नास्तिकोंके साथ काम पड़नेपर भी न जाय। उनके शपथ खाने या प्रतिज्ञा करनेपर भी उनके साथ यात्रा न करे। आसनको पैरसे खींचकर मनुष्य उसपर न बैठे ।। ५० ।।
न नग्नः कर्हिचित् स्नायान्न निशायां कदाचन । स्नात्वा च नावमृज्येत गात्राणि सुविचक्षणः ।। ५१ ।। विद्वान् पुरुष कभी नग्न होकर स्नान न करे। रातमें भी कभी न नहाय। स्नानके पश्चात् अपने अंगोंमें तैल आदिकी मालिश न करावे ।। ५१ ।।
न चानुलिम्पेदस्नात्वा स्नात्वा वासो न निर्धुनेत् । न चैवार्द्राणि वासांसि नित्यं सेवेत मानवः ।। ५२ ।। स्नान किये बिना अपने अंगोंमें चन्दन या अंगराग न लगावे। स्नान कर लेनेपर गीले वस्त्र न झटकारे। मनुष्य भीगे वस्त्र कभी न पहने ।। ५२ ।।
स्रजश्च नावकृष्येत न बहिर्धारयीत च । उदक्यया च सम्भाषां न कुर्वीत कदाचन ।। ५३ ।। गलेमें पड़ी हुई मालाको कभी न खींचे। उसे कपड़ेके ऊपर न धारण करे। रजस्वला स्त्रीके साथ कभी बातचीत न करे ।। ५३ ।।
नोत्सृजेत पुरीषं च क्षेत्रे ग्रामस्य चान्तिके । उभे मूत्रपुरीषे तु नाप्सु कुर्यात् कदाचन ।। ५४ ।। बोये हुए खेतमें, गाँवके आस-पास तथा पानीमें कभी मल-मूत्रका त्याग न करे ।। ५४ ।।
(देवालयेऽथ गोवृन्दे चैत्ये सस्येषु विश्रमे । भक्ष्यान् भुक्त्वा क्षुतेऽध्वानं गत्वा मूत्रपुरीषयोः ।। द्विराचामेद् यथान्यायं हृद्गतं तु पिबन्नपः ।) देवमन्दिर, गौओंके समुदाय, देवसम्बन्धी वृक्ष और विश्रामस्थानके निकट तथा बढ़ी हुई खेतीमें भी मल-मूत्रका त्याग नहीं करना चाहिये। भोजन कर लेनेपर, छींक आनेपर,