भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 918, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 918

आचार्यमथवाप्यन्यं तथायुर्विन्दते महत् । सायंकालमें न सोये, नित्य स्नान करे और सदा पवित्रतापूर्वक रहे। सूर्योदय होनेतक कभी न सोये। यदि किसी दिन ऐसा हो जाय तो प्रायश्चित्त करे। प्रतिदिन प्रातःकाल सोकर उठनेके बाद पहले माता-पिताको प्रणाम करे। फिर आचार्य तथा अन्य गुरुजनोंका अभिवादन करे। इससे दीर्घायु प्राप्त होती है ॥ ४३ १/२ ॥

वर्जयेद् दन्तकाष्ठानि वर्जनीयानि नित्यशः ॥ ४४ ॥ भक्षयेच्छास्त्रदृष्टानि पर्वस्वपि विवर्जयेत् । शास्त्रोंमें जिन काष्ठोंका दाँतन निषिद्ध माना गया है, उन्हें सदा ही त्याग दे—कभी काममें न ले। शास्त्रविहित काष्ठका ही दन्तधावन करे; परंतु पर्वके दिन उसका भी परित्याग कर दे ॥ ४४ १/२ ॥

उदङ्मुखश्च सततं शौचं कुर्यात् समाहितः ॥ ४५ ॥ अकृत्वा देवपूजां च नाचरेद् दन्तधावनम् । सदा एकाग्रचित्त हो दिनमें उत्तरकी ओर मुँह करके ही मल-मूत्रका त्याग करे। दन्तधावन किये बिना देवताओंकी पूजा न करे ॥ ४५ १/२ ॥

अकृत्वा देवपूजां च नाभिगच्छेत् कदाचन । अन्यत्र तु गुरुं वृद्धं धार्मिकं वा विचक्षणम् ॥ ४६ ॥ देवपूजा किये बिना गुरु, वृद्ध, धार्मिक तथा विद्वान् पुरुषको छोड़कर दूसरे किसीके पास न जाय ॥ ४६ ॥

अवलोक्यो न चादर्शो मलिनो बुद्धिमत्तरैः । न चाज्ञातां स्त्रियं गच्छेद् गर्भिणीं वा कदाचन ॥ ४७ ॥ अत्यन्त बुद्धिमान् पुरुषोंको मलिन दर्पणमें कभी अपना मुँह नहीं देखना चाहिये। अपरिचित तथा गर्भिणी स्त्रीके पास भी न जाय ॥ ४७ ॥

(दारसंग्रहणात् पूर्वं नाचरेन्मैथुनं बुधः । अन्यथा त्ववकीर्णः स्यात् प्रायश्चित्तं समाचरेत् ॥ नोदीक्षेत् परदारांश्च रहस्येकासनो भवेत् । इन्द्रियाणि सदा यच्छेत् स्वप्ने शुद्धमना भवेत् ॥) विद्वान् पुरुष विवाहसे पहले मैथुन न करे, अन्यथा वह ब्रह्मचर्य-व्रतको भंग करनेका अपराधी माना जाता है। ऐसी दशामें उसे प्रायश्चित्त करना चाहिये। वह परायी स्त्रीकी ओर न तो देखे और न एकान्तमें उसके साथ एक आसनपर बैठे ही। इन्द्रियोंको सदा अपने वशमें रखे। स्वप्नमें भी शुद्ध मनवाला होकर रहे ॥

उदक्शिरा न स्वपेत तथा प्रत्यक्शिरा न च । प्राक्शिरास्तु स्वपेद् विद्वानथवा दक्षिणाशिराः ॥ ४८ ॥