भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 917, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 917

क्रोधमें आकर पुत्र या शिष्यके सिवा दूसरे किसीको न तो डंडा मारे, न उसे पृथ्वीपर ही गिरावे। हाँ, शिक्षाके लिये पुत्र या शिष्यको ताड़ना देना उचित माना गया है ॥ ३७ ॥ न ब्राह्मणान् परिवदेन्नक्षत्राणि न निर्दिशेत् । तिथिं पक्षस्य न ब्रूयात् तथास्यायुर्न रिष्यते ॥ ३८ ॥ ब्राह्मणोंकी निंदा न करे, घर-घर घूम-घूमकर नक्षत्र और किसी पक्षकी तिथि न बताया करे। ऐसा करनेसे मनुष्यकी आयु क्षीण नहीं होती है ॥ ३८ ॥ (अमावास्यामृते नित्यं दंतधावनमाचरेत् । इतिहासपुराणानि दानं वेदं च नित्यशः ॥ गायत्रीमननं नित्यं कुर्यात् संध्यां समाहितः ।) अमावास्याके सिवा प्रतिदिन दन्तधावन करना चाहिये। इतिहास, पुराणोंका पाठ, वेदोंका स्वाध्याय, दान, एकाग्रचित्त होकर संध्योपासना और गायत्रीमंत्रका जप—ये सब कर्म नित्य करने चाहिये ॥ कृत्वा मूत्रपुरीषे तु रथ्यामाक्रम्य वा पुनः । पादप्रक्षालनं कुर्यात् स्वाध्याये भोजने तथा ॥ ३९ ॥ मल-मूत्र त्यागने और रास्ता चलनेके बाद तथा स्वाध्याय और भोजन करनेके पहले पैर धो लेने चाहिये ॥ ३९ ॥ त्रीणि देवाः पवित्राणि ब्राह्मणानामकल्पयन् । अदृष्टमद्भिर्निर्णिक्तं यच्च वाचा प्रशस्यते ॥ ४० ॥ जिसपर किसीकी दूषित दृष्टि न पड़ी हो, जो जलसे धोया गया हो तथा जिसकी ब्राह्मणलोग वाणीद्वारा प्रशंसा करते हों—ये ही तीन वस्तुएँ देवताओंने ब्राह्मणोंके उपयोगमें लाने योग्य और पवित्र बतायी हैं ॥ संयावं कृसरं मांसं शष्कुलीं पायसं तथा । आत्मार्थं न प्रकर्तव्यं देवार्थं तु प्रकल्पयेत् ॥ ४१ ॥ जौके आटेका हलवा, खिचड़ी, फलका गूदा, पूड़ी और खीर—ये सब वस्तुएँ अपने लिये नहीं बनानी चाहिये। देवताओंको अर्पण करनेके लिये ही इनको तैयार करना चाहिये ॥ ४१ ॥ नित्यमग्निं परिचरेद् भिक्षां दद्याच्च नित्यदा । वाग्यतो दन्तकाष्ठं च नित्यमेव समाचरेत् ॥ ४२ ॥ प्रतिदिन अग्निकी सेवा करे, नित्यप्रति भिक्षुको भिक्षा दे और मौन होकर प्रतिदिन दन्तधावन किया करे ॥ (न संध्यायां स्वपेन्नित्यं स्नायाच्छुद्धः सदा भवेत् ।) न चाभ्युदितशायी स्यात् प्रायश्चित्ती तथा भवेत् । मातापितरमुत्थाय पूर्वमेवाभिवादयेत् ॥ ४३ ॥