महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 916, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंनारुन्तुदः स्यान्न नृशंसवादी न हीनतः परमभ्याददीत । ययास्य वाचा पर उद्विजेत न तां वदेद् रुशतीं पापलोक्याम् ॥ ३१ ॥ दूसरोंके मर्मपर आघात न करे, क्रूरतापूर्ण बात न बोले, औरोंको नीचा न दिखावे। जिसके कहनेसे दूसरोंको उद्वेग होता हो वह रुखाईसे भरी हुई बात पापियोंके लोकमें ले जानेवाली होती है। अतः वैसी बात कभी न बोले ॥ ३१ ॥
वाक्सायका वदनान्निष्पतन्ति यैराहतः शोचति रात्र्यहानि । परस्य वा मर्मसु ये पतन्ति तान् पण्डितो नावसृजेत् परेषु ॥ ३२ ॥ वचनरूपी बाण मुँहसे निकलते हैं, जिनसे आहत होकर मनुष्य रात-दिन शोकमें पड़ा रहता है। अतः जो दूसरोंके मर्मस्थानोंपर चोट करते हैं, ऐसे वचन विद्वान् पुरुष दूसरोंके प्रति कभी न कहे ॥ ३२ ॥
रोहते सायकैर्विद्धं वनं परशुना हतम् । वाचा दुरुक्तं बीभत्सं न संरोहति वाक्क्षतम् ॥ ३३ ॥ बाणोंसे बिंधा और फरसेसे कटा हुआ वन पुनः अंकुरित हो जाता है, किंतु दुर्वचनरूपी शस्त्रसे किया हुआ भयंकर घाव कभी नहीं भरता है ॥ ३३ ॥
कर्णिनालीकनाराचान् निर्हरन्ति शरीरतः । वाक्शल्यस्तु न निर्हर्तुं शक्यो हृदिशयो हि सः ॥ ३४ ॥ कर्णि, नालीक और नाराच—ये शरीरमें यदि गड़ जायँ तो चिकित्सक मनुष्य इन्हें शरीरसे निकाल देते हैं, किंतु वचनरूपी बाणको निकालना असंभव होता है; क्योंकि वह हृदयके भीतर चुभा होता है ॥ ३४ ॥
हीनांगानतिरिक्तांगान् विद्याहीनान् विगर्हितान् । रूपद्रविणहीनांश्च सत्त्वहीनांश्च नाक्षिपेत् ॥ ३५ ॥ हीनांग (अंधे-काने आदि), अधिकांग (छांगुर आदि), विद्याहीन, निन्दित, कुरूप, निर्धन और निर्बल मनुष्योंपर आक्षेप करना उचित नहीं है ॥ ३५ ॥
नास्तिक्यं वेदनिन्दां च देवतानां च कुत्सनम् । द्वेषस्तम्भोऽभिमानं च तैक्ष्ण्यं च परिवर्जयेत् ॥ ३६ ॥ नास्तिकता, वेदोंकी निंदा, देवताओंको कोसना, द्वेष, उद्धण्डता, अभिमान और कठोरता—इन दुर्गुणोंका त्याग कर देना चाहिये ॥ ३६ ॥
परस्य दण्डं नोद्यच्छेत् क्रुद्धो नैनं निपातयेत् । अन्यत्र पुत्राच्छिष्याच्च शिक्षार्थं ताडनं स्मृतम् ॥ ३७ ॥