भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 915, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 915

तावद् वर्षसहस्राणि नरकं पर्युपासते ॥ २२ ॥ स्त्रियोंके शरीरमें जितने रोमकूप होते हैं, उतने ही हजार वर्षोंतक व्यभिचारी पुरुषोंको नरकमें रहना पड़ता है ॥ २२ ॥ प्रसाधनं च केशानामञ्जनं दन्तधावनम् । पूर्वाह्न एव कार्याणि देवतानां च पूजनम् ॥ २३ ॥ केशोंको सँवारना, आँखोंमें अंजन लगाना, दाँत-मुँह धोना और देवताओंकी पूजा करना—ये सब कार्य दिनके पहले प्रहरमें ही करने चाहिये ॥ २३ ॥ पुरीषमूत्रे नोदीक्षेन्नाधितिष्ठेत् कदाचन । नातिकल्यं नातिसायं न च मध्यन्दिने स्थिते ॥ २४ ॥ नाज्ञातैः सह गच्छेत नैको न वृषलैः सह । मल-मूत्रकी ओर न देखे, उसपर कभी पैर न रखे। अत्यन्त सबेरे, अधिक साँझ हो जानेपर और ठीक दोपहरके समय कहीं बाहर न जाय। न तो अपरिचित पुरुषोंके साथ यात्रा करे, न शूद्रोंके साथ और न अकेला ही ॥ २४ १/२ ॥ पन्था देयो ब्राह्मणाय गोभ्यो राजभ्य एव च ॥ २५ ॥ वृद्धाय भारतप्ताय गर्भिण्यै दुर्बलाय च । ब्राह्मण, गाय, राजा, वृद्ध पुरुष, गर्भिणी स्त्री, दुर्बल और भारपीड़ित मनुष्य यदि सामनेसे आते हों तो स्वयं किनारे हटकर उन्हें जानेका मार्ग देना चाहिये ॥ २५ १/२ ॥ प्रदक्षिणं च कुर्वीत परिज्ञातान् वनस्पतीन् ॥ २६ ॥ चतुष्पथान् प्रकुर्वीत सर्वानैव प्रदक्षिणान् । मार्गमें चलते समय अश्वत्थ आदि परिचित वृक्षों तथा समस्त चौराहोंको दाहिने करके जाना चाहिये ॥ मध्यन्दिने निशाकाले अर्धरात्रे च सर्वदा ॥ २७ ॥ चतुष्पथं न सेवेत उभे संध्ये तथैव च । दोपहरमें, रातमें, विशेषतः आधी रातके समय और दोनों संध्याओंके समय कभी चौराहोंपर न रहे ॥ उपानहौ च वस्त्रं च धृतमन्यैर्न धारयेत् ॥ २८ ॥ ब्रह्मचारी च नित्यं स्यात् पादं पादेन नाक्रमेत् । अमावास्यां पौर्णमास्यां चतुर्दश्यां च सर्वशः ॥ २९ ॥ अष्टम्यां सर्वपक्षाणां ब्रह्मचारी सदा भवेत् । आक्रोशं परिवादं च पैशुन्यं च विवर्जयेत् ॥ ३० ॥ दूसरोंके पहने हुए वस्त्र और जूते न पहने। सदा ब्रह्मचर्यका पालन करे। पैरसे पैरको न दबाये। सभी पक्षोंकी अमावास्या, पौर्णमासी, चतुर्दशी और अष्टमी तिथिको सदा ब्रह्मचारी रहे—स्त्री-समागम न करे। किसीकी निंदा, बदनामी और चुगली न करे ॥ २८—३० ॥

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