भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 914, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 914

जो क्रोधहीन, सत्यवादी, किसी भी प्राणीकी हिंसा न करनेवाला, अदोषदर्शी और कपटशून्य है, वह सौ वर्षोंतक जीवित रहता है ॥ १४ ॥ लोष्टमर्दी तृणच्छेदी नखखादी च यो नरः । नित्योच्छिष्टः संकुसुको नेहायुर्विन्दते महत् ॥ १५ ॥ जो ढेले फोड़ता, तिनके तोड़ता, नख चबाता तथा सदा ही उच्छिष्ट (अशुद्ध) एवं चंचल रहता है, ऐसे कुलक्षणयुक्त मनुष्यको दीर्घायु नहीं प्राप्त होती ॥ १५ ॥ ब्राह्मे मुहूर्ते बुध्येत धर्मार्थौ चानुचिंतयेत् । उत्थायाचम्य तिष्ठेत् पूर्वा संध्यां कृताञ्जलिः ॥ १६ ॥ प्रतिदिन ब्राह्ममुहूर्तमें (अर्थात् सूर्योदयसे दो घड़ी पहले) जागे तथा धर्म और अर्थके विषयमें विचार करे। फिर शय्यासे उठकर शौच-स्नानके पश्चात् आचमन करके हाथ जोड़े हुए प्रातःकालकी संध्या करे ॥ १६ ॥ एवमेवापरां संध्यां समुपासीत वाग्यतः । नेक्षेतादित्यमुद्यन्तं नास्तं यान्तं कदाचन ॥ १७ ॥ इसी प्रकार सायंकालमें भी मौन रहकर संध्योपासना करे। उदय और अस्तके समय सूर्यकी ओर कदापि न देखे ॥ १७ ॥ नोपसृष्टं न वारिस्थं न मध्यं नभसो गतम् । ऋषयो नित्यसंध्यत्वाद् दीर्घमायुरवाप्नुवन् ॥ १८ ॥ तस्मात् तिष्ठेत् सदा पूर्वा पश्चिमां चैव वाग्यतः । ग्रहण और मध्याह्नके समय भी सूर्यकी ओर दृष्टिपात न करे तथा जलमें स्थित सूर्यके प्रतिबिम्बकी ओर भी न देखे। ऋषियोंने प्रतिदिन संध्योपासना करनेसे ही दीर्घ आयु प्राप्त की थी। इसलिये सदा मौन रहकर द्विजमात्रको प्रातःकाल और सायंकालकी संध्या अवश्य करनी चाहिये ॥ १८ १/२ ॥ ये न पूर्वामुपासन्ते द्विजाः संध्यां न पश्चिमाम् ॥ १९ ॥ सर्वांस्तान् धार्मिको राजा शूद्रकर्माणि कारयेत् । जो द्विज न तो प्रातःकालकी संध्या करते हैं और न सायंकालकी ही, उन सबसे धार्मिक राजा शूद्रोचित कर्म करावे ॥ १९ १/२ ॥ परदारा न गन्तव्या सर्ववर्णेषु कर्हिचित् ॥ २० ॥ न हीदृशमनायुष्यं लोके किंचन विद्यते । यादृशं पुरुषस्येह परदारोपसेवनम् ॥ २१ ॥ किसी भी वर्णके पुरुषको कभी भी परायी स्त्रियोंसे संसर्ग नहीं करना चाहिये। परस्त्री-सेवनसे मनुष्यकी आयु जल्दी ही समाप्त हो जाती है। संसारमें परस्त्री-समागमके समान पुरुषकी आयुको नष्ट करनेवाला दूसरा कोई कार्य नहीं है ॥ २०-२१ ॥ यावन्तो रोमकूपाः स्युः स्त्रीणां गात्रेषु निर्मिताः ।