महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 913, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंदुराचारो हि पुरुषो नेहायुर्विन्दते महत् । त्रसन्ति यस्माद् भूतानि तथा परिभवन्ति च ॥ ७ ॥ दुराचारी पुरुष, जिससे समस्त प्राणी डरते और तिरस्कृत होते हैं, इस संसारमें बड़ी आयु नहीं पाता ॥
तस्मात् कुर्यादिहाचारं यदिच्छेदू भूतिमात्मनः । अपि पापशरीरस्य आचारो हन्त्यलक्षणम् ॥ ८ ॥ अतः यदि मनुष्य अपना कल्याण करना चाहता हो तो उसे इस जगत्में सदाचारका पालन करना चाहिये। जिसका सारा शरीर ही पापमय है, वह भी यदि सदाचारका पालन करे तो वह उसके शरीर और मनके बुरे लक्षणोंको दबा देता है ॥ ८ ॥
आचारलक्षणो धर्मः संतश्चारित्रलक्षणाः । साधूनां च यथावृत्तमेतदाचारलक्षणम् ॥ ९ ॥ सदाचार ही धर्मका लक्षण है। सच्चरित्रता ही श्रेष्ठ पुरुषोंकी पहचान है। श्रेष्ठ पुरुष जैसा बर्ताव करते हैं; वही सदाचारका स्वरूप अथवा लक्षण है ॥ ९ ॥
अप्यदृष्टं श्रवादेव पुरुषं धर्मचारिणम् । भूतिकर्माणं कुर्वाणं तं जनाः कुर्वते प्रियम् ॥ १० ॥ जो मनुष्य धर्मका आचरण करता और लोक-कल्याणके कार्यमें लगा रहता है, उसका दर्शन न हुआ हो तो भी मनुष्य केवल नाम सुनकर उससे प्रेम करने लगते हैं ॥ १० ॥
ये नास्तिका निष्क्रियाश्च गुरुशास्त्राभिलङ्घिनः । अधर्मज्ञा दुराचारास्ते भवन्ति गतायुषः ॥ ११ ॥ जो नास्तिक, क्रियाहीन, गुरु और शास्त्रकी आज्ञाका उल्लंघन करनेवाले, धर्मको न जाननेवाले और दुराचारी हैं, उन मनुष्योंकी आयु क्षीण हो जाती है ॥ ११ ॥
विशीला भिन्नमर्यादा नित्यं संकीर्णमैथुनाः । अल्पायुषो भवन्तीह नरा निरयगामिनः ॥ १२ ॥ जो मनुष्य शीलहीन, सदा धर्मकी मर्यादा भंग करनेवाले तथा दूसरे वर्णकी स्त्रियोंके साथ सम्पर्क रखनेवाले हैं; वे इस लोकमें अल्पायु होते और मरनेके बाद नरकमें पड़ते हैं ॥ १२ ॥
सर्वलक्षणहीनोऽपि समुदाचारवान् नरः । श्रद्दधानोऽनसूयुश्च शतं वर्षाणि जीवति ॥ १३ ॥ सब प्रकारके शुभ लक्षणोंसे हीन होनेपर भी जो मनुष्य सदाचारी, श्रद्धालु और दोषदृष्टिसे रहित होता है, वह सौ वर्षोंतक जीवित रहता है ॥ १३ ॥
अक्रोधनः सत्यवादी भूतानामविहिंसकः । अनसूयुरजिह्मश्च शतं वर्षाणि जीवति ॥ १४ ॥